Monday, 22 August 2016

फ़िल्म का इतिहास ( भाग-2 उत्तर)

.        फ़िल्म का इतिहास  ( भाग-1 आप पड़ चुके है अब अगला भाग-2 उत्तर) 



13 राबर्ट ब्रेसों (फ्रांसीसी)


इन्हे आध्यात्मिक शैली के लिए जाना जाता है | जब फ्रांस मे नए सिनेमा की लहर चली तो उन्होने इसमे खास योगदान ही नहीं दिया बल्कि एक अमित छाप भी छोड़ी |
स्वीडिस निर्देशक गोदार्द कहते इनके बारे मे कहते थे की जिस प्रकार रूस के उपन्यास कार दस्तोएव्स्की , जर्मन के संगीत कार मोजार्ट के बगैर अधूरा है उसी प्रकार फ्रांस के सिनेमा की बात ब्रेसों के बगैर व्यर्थ है |
ब्रेसों पहले पेंटर थे, फिर फोटोग्राफर बने | कई छोटी छोटी फिल्में बनाई | उनकी फिल्मों मे दूसरे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बदलती दुनिया और एकात्म होती प्रवत्ति का असर दिखता  था |
उन्होने 60 साल तक की उम्र मे मात्र 13 फिल्में ही बनाई लेकिन वे सारी फिल्मे अपने ट्रीटमेंट के हिसाब से बेजोड़ थी |
डायरी ऑफ अ कंट्री, पिकपाकेट,अ हजार्ड बाथजार, द ट्रायल ऑफ जॉन ऑफ आर्क ऐसी ही फिल्मों मे शुमार थी |
14. इंगमार बर्गमैन (स्वीडन)

 इन्हे फिल्में बनाए के लिए कभी ज्यादा पैसो की जरूरत नहीं पड़ी | उन्होने सिनेमा जगत को सिखाया कि किस तरह फिल्मों को सुनियोजित तरीके से एक टीम के जरिये फिल्म का उत्पादन किया जा सकता है |
उनकी खुद की फिल्मों के विषय अवसाद और निराशा से जुड़े होते थे | इन्हे नए तरह के शॉट फिल्मों मे प्रयोग करने के लिए जाना जाता है |
वे एक ऐसे निर्देशक है जिन्होने फिल्म के साथ साथ थियेटर मे भी काम किया | उन्होने जहां 60 फिल्मों का निर्देशन किया वही 170 से ज्यादा नाटकों का भी निर्देशन किया है |
वर्गमैन कि आखिरी फिल्म फैनी एंड अलेक्ज़ेंडर 1982’  थी | यह फिल्म 5 घंटे की थी |
इसके अलावा इनहोने द सेवेन्थ सील,वाइल्ड स्ट्राबेरीज़, व्विस्पर, क्राइज़ एंड पर्सोना नाम कि फिल्मे बनाई है |

15. फ़्रांकोइस रोनाल्डो (फ्रेंच)
 वर्ल्ड सिनेमा मे ऐसे कम ही लोग है जो व्यावसायिक तौर पर भी सफल रहे | जब फ्रांस मे नए सिनेमा कि लहर चली तो मजबूत तारीके से दर्शको को उन्होने अपनी फिल्मों के जरिये जोड़ा |
• वे 52 साल ही जिये, पर वो निर्देशक के साथ साथ स्क्रीन राइटर, फिल्म आलोचक के तौर पर भी जाने जाते थे|
उन्होने 25 फिल्मे बनाई |
जब हम कभी  सिनेमा मे बदलाव कि बात करते है तो इनकी फिल्म द 400 ब्लोज़ का नाम लेते है | इस फिल्म के साथ विश्व सिनेमा कि नई चेतना को समझा जा सकता है |
बचपन मे फीस न भर पाने के कारण उन्हे स्कूल से निकाल दिया गया था फिर इनहोने 14 साल कि उम्र मे तय इया कि वो खुद कमा कर पढ़ाई करेंगे?
ये पढ़ाई क्या थी :- रोज तीन फिल्मे और हफ्ते मे तीन किताबें पढ़ना

16. माइकल एंजेलो अंटोनियोनि

 महान इतालवी निर्देशक अंटोनियोनि कि फिल्मों मे आधुनिक जीवन शैली से उत्पन्न विरोधाभाषों और नैतिक संकटों का वर्णन मिल जाता है,
अंटोनियोनि पहले रंगीन सिनेमा से परहेज करते थे | लेकिन जब रंगीन फिल्मों कि बारी आई तो उन्होने अपना जौहर दिखाया |
उनकी सबसे सफल फिल्म चाइम्स ऑफ मिड नाइट है | यह फिल्म शेक्सपियर के कई नाटकों पर आधारित होने के साथ उनकी खुद कि निजी ज़िंदगी पर भी आधारित है |
अंतोनियोनी की फिल्में अक्सर मानव मन की गहराइयों को टटोलती थीं, मगर उनकी वैश्विक अपील थी, जो मनुष्य की त्रासदी की बयान करती थी. करीब दो दशकों तक अंतोनियोनी ने अपनी फिल्मों के जरिए द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की संवेदना को अभिव्यक्त करने का काम किया.

17. सर्गेई आइन्स्टाइन (सोवियत )

इनका पूरा नाम सर्गेई मिखाइलोविच आइस्टाइन था | उन्होने न केवल एक से बढ़ाकर एक मूक फिल्में बल्कि जब बोलती फिल्मों का दौर आया तो फिल्मों कि दुनिया मे एक अलग रेखा खींची|
• अपने 24 साल के कैरियर मे उन्होने सिर्फ 6 पूर्ण फिल्मे बनाई | स्ट्राइक (1924),बैटलशिप पोटेमकिन (1925), आक्टोबर (1928), ओल्ड एंड न्यू(1929), अलेक्ज़ेंडर नेवस्की(1938),इवान द टैरिवल (1944)
बाकी तीन दर्जन फिल्में अधूरी फिल्मे शब्दबद्ध होकर बाहर आ गयी |
 •इनका पूरा नाम सर्गेई मिखाइलोविच आइस्टाइन था | उन्होने न केवल एक से बढ़ाकर एक मूक फिल्में बल्कि जब बोलती फिल्मों का दौर आया तो फिल्मों कि दुनिया मे एक अलग रेखा खींची|
• अपने 24 साल के कैरियर मे उन्होने सिर्फ 6 पूर्ण फिल्मे बनाई | स्ट्राइक (1924),बैटलशिप पोटेमकिन (1925), आक्टोबर (1928), ओल्ड एंड न्यू(1929), अलेक्ज़ेंडर नेवस्की(1938),इवान द टैरिवल (1944)
बाकी तीन दर्जन फिल्में अधूरी फिल्मे शब्दबद्ध होकर बाहर आ गयी |
इनका पूरा नाम सर्गेई मिखाइलोविच आइस्टाइन था | उन्होने न केवल एक से बढ़ाकर एक मूक फिल्में बल्कि जब बोलती फिल्मों का दौर आया तो फिल्मों कि दुनिया मे एक अलग रेखा खींची|
• अपने 24 साल के कैरियर मे उन्होने सिर्फ 6 पूर्ण फिल्मे बनाई | स्ट्राइक (1924),बैटलशिप पोटेमकिन (1925), आक्टोबर (1928), ओल्ड एंड न्यू(1929), अलेक्ज़ेंडर नेवस्की(1938),इवान द टैरिवल (1944)
बाकी तीन दर्जन फिल्में अधूरी फिल्मे शब्दबद्ध होकर बाहर आ गयी |
ज्यां लुक गोदार (फ्रांसीसी )
ज्यां लुक गोदर्द के बगैर विश्व सिनेमा की चर्चा बेकार है | यह सही है की पूरे विश्व के सिनेमा मे सबसे ज्यादा योगदान फ्रांस के सिनेकारों का ही रहा है |
गोदार पहले पेशेवर आलोचक थे | फिर उन्होने फिल्म बनाने की तरफ अपना रुक्ख मोड़ा | उनकी फिल्मों मे बहुत तीखे राजनीतिक दृष्टिकोण होते थे | जिसके साथ दुनिया मे व्यापक चेतना वाली अलग तरह की राजनीतिक फिल्मों की शुरुआत हुई | उनका यकीन न तो घोर व्यावसायिक फिल्म मे था न ही घोर समानान्तर फिल्म की तरफ |
पश्चिम के कई समीक्षक गोदार को द्वितीय विश्‍वयुद्ध के बाद का सबसे प्रभावशाली फिल्‍मकार मानते हैं। इस 80 वर्षीय जीनियस फिल्‍मकार की पहली ही फिल्‍म ब्रेथलैस’ (1959) ने दुनिया में सिनेमा की भाषा और शिल्‍प को बदल कर रख दिया था।
 जीगा वर्तोव
 •इनका सही नाम डेविड अबेलेविच कोफमैन था | वे सोवियत वृत्तचित्र कार,न्यूज़रील निर्देशक और फिल्म के सिध्दांतकार भी थे
इनकी फिल्म मैन विद ए मूवी कैमरा विश्व की श्रेष्ठ फिल्मों मे गिनी जाती है |
इनकी मूक दौर की प्रसिद्ध फिल्म विश्व का छठा भाग थी | इसे सिने कविता भी कहा गया |
ध्वनि आने के बाद वर्तोव ने एक और फिल्म 1930 मे बनाई | फिल्म का हिन्दी नाम उल्लास था | (enthusiasm) | 1934 मे लेनिन के तीन गीत नाम की एक फिल्म और बनाई

 18   जफर पनाही (ईरान)

     फिल्मों की दुनिया जितनी सतरंगी है कहीं-कहीं उतनी डार्क भीकई काले अध्याय इस क्रियेटिव माध्यम से चिपके हुए भी मिलते हैं..11 जुलाई1960 मे जन्मे ज़फ़र पनाही की फिल्मों पर बीस साल का प्रतिबंध विश्व सिनेमा का एक डार्क साइड ही है.. सोच कर देखिए..इस ख्याल से आप सहम जायेंगे कि एक फिल्मकार को सिर्फ इसलिए छः साल की कैद दी गयी क्योंकि वो अपने देश के क़ानून की हकीकत तराश रहा था..
     जी हां..ज़फ़र पनाही ईरान के फेमस फिल्मकारहैं..उन्हें दिसंबर 2010 में छः साल की जेल दी गईउन पर ,सरकार के मूल्यों के ख़िलाफ़ काम करने का आरोप है..बीस साल तक फिल्म निर्माण की हर विधा पर बैन के साथ उन्हे विदेश जाने तक की इजाज़त नहीं हैये क्रियेटिविटी पर पहरे के जैसा हैवर्ल्ड सिनेमा को नायाब फिल्मों से सजाने वाले पनाही की सिनेमाई अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध है.. वजह 2006 में आयी उनकी फिल्म ऑॅफ़ साइड रही..
     फिल्म की कहानी लड़कियों के एक ग्रुप के बारे में थी जो ईरानी क़ानून के उल्लंघन का दुस्साहस करते हुए पंहुच जाती हैं फुटबॉल मैच देखने..दरअसल ईरानी क़ानून के मुताबिक महिलाओं को स्टेडियम में फ़ुटबॉल मैच देखने की मनाही है..ये प्रतिबंध कितना कठोर है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि ऐसे स्टेडियम में वीमेन टॉयलेट्सतक नही बनाये गये हैं..गौरतलब है कि ऑफ साइडपनाही की अपनी ज़िन्दगी से बावस्ता है…

19 .बकौल-पनाही-

फुटबॉल देखने की मेरी बेटी की ख्वाहिश को मैं चाहकर भी कभी पूरा नहीं कर पाया क्योंकि मैं ईरान के उस क़ानून से वाकिफ़ था जिसमें औरतों को ऐसे मैच देखने की इजाज़त नहीं..इसी टीस ने ऑफ साइडमुझे बनाने की प्रेरणा दी
हंसते हंसाते
फुटबॉल के मैच के रोमांच को न देख पाने की विवशता के बीच स्त्रियों की स्वतंत्रता से जुड़े कई सवालों को सहजता से दिखाती ये फिल्म भले ही ईरान में बैन कर दी गई मगर दुनिया भर में ये सिर्फ बेहद कामयाब रही बल्कि बर्लिन फिल्म फेस्टिवल के प्रतिष्ठित अवार्ड सिल्वर बीयर से सम्मानित भी की गई..
पनाही ने ऑफ साइड के पहले एक लाजवाब फिल्म द सर्किल बनायी..साल 2000 मे आयी ये फिल्म भी ईरान में बैन थी.. फिल्म की शुरूआत एक हॉस्पिटल के मैटर्निटी वार्ड की सुबह से होती है और अंत जेल की काल कोठरी में बीत रही एक शाम पर..फिल्म एक ऐसी महिला के इर्द-गिर्द घूमती है जिसने हाल ही में एक बेटी को जन्म दिया है जबकी अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट में बेटा होने की बात रहती है
ये नारी पीड़ा का बेहद दमदार प्रस्तुतिकरण था जिसने सभी को झकझोर दिया,,
     मेरे ख्याल से पनाही से बेहतर स्त्रियों को कोई नहीं समझ सकता.
     वो अपनी फिल्म The White Baloon में एक छोटी बच्ची की मासूम सी परेशानी पर कहानी कह जाते हैं..फिल्म की यही सात साल की बच्ची हीरोइन है..जिसकी ज़िन्दगी में विलेन परिस्थितियां हैं..ईरानी और खास तौर से पनाही की फिल्मों में कोई विलेन नहीं होता..उलझनों और दिक्कतों को रास्ते के कांटे के तौर पर दिखाया जाता है..ये फिल्में हमेशा बुराई पर अच्छाई की जीत की प्रतीकात्मक पेशकश सरीखी होती हैं..और दि व्हाइट बलून में रजिया नाम की इस नन्ही सी जान की दुश्मन भी परिस्थितियां हैं.
     .कहानी में ईरानी नये साल का बैक्ड्रॉप है जिसके लिए रजिया को गोल्डफिश चाहिए..मां गरीब है मगर बेटी की इस ख्वाहिश को पूरा करते हुए हिदायत देती है कि इसे गुमाना मत..बस यहीं से रजिया और इस पैसे के बीच आंख मिचौली का खेल शु डिग्री हो जाता है.
     .रजिया पहली बार पैसे गंवाती है और फिर उसे हासिल भी कर लेती है मगर दूसरी बार ये पैसे उसके सामने पड़े होते हुए भी उसकी पहुंच से दूर होते हैं..इन रूपयों को पाने में वो कईयों से मदद मांगती है और पूरी फिल्म उसकी इसी जद्दोजहद पर तराशी गई भावनात्मक पेंटिग है।सच में धरती पर मनुष्य की आधी आबादी यानि कि स्त्रियों के हक़ की बात करता पनाही का सिनेमा विश्व भर के फिल्मकारों को नई राह दिखाता है..लेकिन सवाल जिसका जवाब नहीं है कि पनाही अब कभी फिल्में बना पायेंगे या नहीं..क्या विश्व सिनेमा समुदाय ईरानी हुकुमत के खिलाफ बेबस है? अगर हां तो मुझे लगता है कि विश्व सिनेमा भी एक तरह के प्रतिबंध में जी रहा है।

      20  अकीरा कुरासोवा (जापान)

     1936 मे इन्होने जापानी फिल्म इंडस्त्री मे कदम रखा | पहले वो पेंटर थे, शुरुआत मे कई फिल्मों की स्क्रिप्ट राइटिंग और सह निर्देशन किया |
      1943 मे दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उन्होने पहली बार निर्देशक के रूप बेहद लोकप्रिय फिल्म साशिरो सुगता बनाई | फिर युद्ध के बाद सराही गई फिल्म ड्रंकन एंजल | उनकी पत्नी खुद फिल्मों मे अभिनेत्री हुआ करती थी | 80 के दशक मे उन्होने कागेमुशा और रान फिल्म बनाई | उन्हे सौ सालो मे एशिया की बहतारी के लिए काम करने वाला कहा गया |
      अकीरा कुरोसावा की श्वेत-श्याम फ़िल्म 'राशोमोन' एक ही घटना का तीन अलग - अलग तरीकों से जीवंत प्रस्तुतीकरण है।

21  स्वाधीनता आंदोलन और हिन्दी सिनेमा-

     आज़ादी, इस एक शब्द मे न जाने कितनी कुर्बानियाँ, कितनी कल्पनाएं, कितने कष्ट,कितने कंदन और कितने प्रयास छिपे है इसका कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता | स्वतन्त्रता के लिए आंदोलन हुए,लड़ाइयाँ लड़ी गयी,पीड़ाए मिली,असंख्य शहादतें हुई तब जाकर कहीं आज़ादी मिली |
     15 अगस्त 1947 को भारत भूमि पर आज़ादी की सुनहरी किरने पड़ी, देशवासी फूलों की तरह खिल उठे | सदियों की गुलामी से मुक्त  होकर देशवासियों ने खुली हवा मे सांस ली | नए भारत के निर्माण मे राष्ट्र नेता जुट गए |
     आज़ाद  भारत के भविष्य निर्माता, देश को उन्नतशील बनाने की सोच के साथ कई योजनाओं का निर्माण और इसका कार्यान्वयन करने मे लग गए |
     1951 मे भारत के विकास के लगभग दो हज़ार उनसठ करोड़ रुपये की पंचवर्षीय योजना की घोषणा की गयी |
     1949 मे आज़ाद भारत की सरकार ने एस के पाटिल की अध्यक्षता मे जो फिल्म इन्क्वायरी कमेटी गठित की थी उसने सन 1951 मे अपनी रिपोर्ट पेश करते हुए फिल्म जगत को स्टूडियों पद्धति से मुक्त करते हुए व्यतिगत क्षमता वाले निर्माताओं को फिल्म निर्माण मे आने का सुझाव दिया और फिल्म निर्माण मे व्यव हो रहे काले धनो से मुक्ति पर बल दिया |
     1952 मे आज़ाद भारत प्रथम बार आम चुनाव हुआ और पंडित जवाहर लाल नेहरू देश के पहले प्रधान मंत्री बने |
     इसी वर्ष भारतीय फिल्म समारोह की शुरूआत हुई जो फिल्म्स डिवीजन द्वारा मुंबई,चेन्नई,कोलकाता,मद्रास,और कोलकाता मे आयोजित किया गया |
     इसी साल द इंडियन सिनेमेटोग्राफ एक्ट 1952 को सर्वसम्मति से पास किया गया जो 1918 मे तत्कालीन ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाए गए एक्ट से कई प्रकार से भिन्न था |
     1952 मे संगेट नाटक एकेडमी की स्थापना हुई तथा 1954 मे नेशनल गैलरी ऑफ मार्डन आर्ट नयी दिल्ली मे स्थापित किया गया |
     1955 मे अमेरिका के न्यूयार्क शहर के म्यूजियम ऑफ मार्डन आर्ट मे भारतीय फ़िल्मकार सत्यजीत रे की प्रथम बांग्ला फिल्म पांथर पांचाली का वर्ल्ड प्रीमियम हुआ | इसी साल भारत ने बाल फिल्मों को प्रोत्साहन के लिए द चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी की स्थापना की गयी |
     स्वतन्त्रता के पाँच वर्ष बाद,1952 मे अड़तालीस सौ करोड़ की राशि से द्वितीय पंचवर्षे योजना शुरू की गयी | 1958 मे कॉपी राइट एक्ट तथा 1959 मे दूरदर्शन की स्थापना हुई |
     लाल बहादुर शास्त्री देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने |1951 मे एस के पाटिल की अध्यक्षता मे फिल्म इंक्वायरी  कमेटी की रिपोर्ट मे दर्ज सुझावों पर अमल करते हुए तेरह चौदह वर्ष बाद भारतीय राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार (फिल्म आर्काइव) की स्थापना पुणे मे की गयी |
     कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान देश के बटवारे के समय से ही लड़ रहा था | और फिर उसे इसी को मुद्दा बनाकर 1965 मे भारत मे आक्रमण कर दिया | भारतीयों ने डट कर मुक़ाबला किया और पाकिस्तान को हराया |
     आज़ादी के बाद भारत ने एक नहीं पाँच पाँच युद्ध झेले | जिसमे से चार पाकिस्तान और एक बार चीन से |
     1966 मे दादा साहब फाल्के के नाम पर फिल्म मे योगदान के लिए हर वर्ष पुरस्कार की शुरुआत हुई |
     1956 से 66 के समय मे सामाजिक फिल्मों का चलन चरम पर था | इन फिल्मों मे अपने समय से जुड़ी तमाम सामाजिक समस्याओं को उठाया गया था |
     इनमे बी आर चोपड़ा की एक ही रास्ता 1956,नया दौर 1957, साधना1958,घूल का फूल1959,
     आर के फिल्म्स की जागते रहो 1956,जिस देश मे गंगा बहती है 1960,गुरुदत्त की प्यासा 1957, कजाग के फूल 1959,
      महबूब प्रोडकसन की  मदर इंडिया 1957
     शक्ति पिक्चर्स की इंसान जाग उठा 1959,
      कृष्ण चोपड़ा की हीरा मोती 1959,
     महल पिक्चर्स की दिल अपना प्रेत पराई 1960 आदि प्रमुख थी |
      गौर से देखे तो पता चलता है की इन फिल्मों के माध्यम से समाज के धुखते रंग को पहचानना सुधारवादी दृष्टिकोण के तहत समाज को एक दिशा देने की कोशिश की गयी |
     पचास के दशक के बाद आइये अब बात करते है साठ के दशक मे बनी फिल्मों की |
     इस दौरान देश की राजनीतिक और सामाजिक बदलाव  के बीच फिल्मों मे आई परिवर्तन की धारा को देख और परख सकते है |
     1961 मे नितिन बॉस की फिल्म गंगा जमुना पूर्वी भारत के किसी गाँव की कहानी है | जहां दो भाइयों मे बड़ा भाई गाँव के जमीदार के जुल्म के कारण गाँव से सटे पहाड़ियों पर जाकर शरण लेता है और जमीदार से बदला लेने के लिए डाकू बन जाता है | और दूसरा भाई पढ़ लिख कर इंस्पेक्टर बन गाँव मे आता है |
     स्वतंत्रता मिलने के बाद भारत मे चहुमुखी विकास के दरवाजे खुल गए थे | यह धारणा भी बन गयी थी कि देश मे  काम करने वाले ही खाएँगे ,और वे ही कमाएंगे | 1965 आते आते देश से जमीदारी और नवबीयत का रुआब कम होने लगा था |
     मुंशी  प्रेमचन्द्र द्वारा सन 1930 मे लिखित उपन्यास गबन पर 1966  मे कृष्ण और इनके मरने के बाद ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन मे फिल्म गबन बनी | फिल्म,  1928 मे इलाहाबाद मे अङ्ग्रेज़ी शासकों के विरुद्ध भड़की भारतियों कि भावनाओं और सन 1929 मे महात्मा गांधी और लार्ड इरविन के बीच हुए समझौतों कि पृष्ठभूमि पर आधारित है |
     1965 मे नवकेटन के बैनर तले बनी फिल्म प्रेम पुजारी आई | फिल्म 1965 मे भारत पाक लड़ाई कि पृष्ठभूमि मे युद्ध और शांति की बातें करने वाली थी | यह फिल्म देवानन्द ने बनाई थी |
     1967 मे निर्माता निर्देशक मनोज कुमार की फिल्म उपकार आई | राष्ट्रीय भावना पर आधारित फिल्म उपकार कि कहानी भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री द्वारा राष्ट्र को दिया गया नारा जय जवान जय किसान से प्रभावित थी |
     हर महत्वपूर्ण घटना और अवसर को पर्दे पर उतार दुनिया तक पहुंचाने वाले इस बॉलिवुड में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी यूं तो कई फिल्मों का निर्माण किया गया है लेकिन उनमें से कुछ फिल्में इतनी मार्मिक हैं कि देखने वालों की आंखों में आंसू ले आएं. इतना ही नहीं आजादी के बाद भारतीयों में देश प्रेम का जज्बा कहीं कम ना हो जाए इसीलिए स्वतंत्रता संग्राम के अलावा देश प्रेम पर आधारित फिल्में भी समय-समय पर निर्मित की जाती रही हैं...............
     मदर इंडिया महबूब खान निर्देशित यह फिल्म बॉलिवुड की सबसे अधिक सफल फिल्मों में से एक है. वर्ष 1957 में प्रदर्शित फिल्म मदर इंडिया की पृष्ठभूमि अभी-अभी आजाद हुए देश और उसके दयनीय हालातों पर केंद्रित है. इस फिल्म की कहानी एक ऐसी महिला के इर्द-गिर्द घूमती है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने दोनों बच्चों का पालन-पोषण करती है. नए-नए आजाद हुए भारत में व्यक्ति को किस गरीबी और भुखमरी का सामना करना पड़ा यह इस फिल्म में साफ प्रदर्शित किया गया था.
     पूरब और पश्चिम देश भक्ति पर आधारित यह अब तक की सबसे कामयाब फिल्मों में से एक है. मनोज कुमार, जिन्हें एक समय बाद भारत कुमारके नाम से भी जाना जाने लगा था, और सायरा बानो अभिनीत इस फिल्म में विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों और भारतीय लोगों की सोच और जीवनशैली को दर्शाया गया था. वर्ष 1970 में प्रदर्शित यह फिल्म मनोज कुमार की देश भक्ति पर आधारित तीसरी फिल्म थी.
     शहीद वर्ष 1964 में रिलीज यह फिल्म भी मनोज कुमार अभिनीत थी. इस फिल्म का गीत सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, जो मौलिक तौर पर प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी राम प्रसाद बिस्मिल की रचना है, एक बड़ी हिट साबित हुई थी. आज भी इस फिल्म की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है.
     क्रांति 1981 में प्रदर्शित फिल्म क्रांति की पृष्ठभूमि भी स्वतंत्रता आंदोलन पर ही आधारित थी. मनोज कुमार, शशि कपूर, हेमा मालिनी और दिलीप कुमार द्वारा अभिनीत इस फिल्म में 1925 से 1875 तक के काल को दर्शाया गया है. इस फिल्म की कहानी जावेद अख्तर द्वारा लिखी गई थी और इसका निर्माण-निर्देशन मनोज कुमार ने किया था.
      बॉर्डर वर्ष 1997 में आधारित इस फिल्म में भारत-पाक जंग पर आधारित इस फिल्म के द्वारा आजादी के बाद जंग के मैदान और सैनिकों के परिवारों की दास्तां बयां की गई है. मानवीय संवेदनाओं पर आधारित यह फिल्म आज भी देखने वाले लोगों की आंखों में आंसू ले आती है.
     . रंग दे बसंती राकेश ओमप्रकाश मेहरा द्वारा निर्देशित यह फिल्म युवाओं के अंदर देशप्रेम के भाव को जगाने के उद्देश्य से बनाई गई थी. कॉलेज में पढ़ने वाले मनमौजी युवाओं का जब असल जीवन से सामना होता है तो उन्हें किन-किन हालातों से गुजरना पड़ता है यह फिल्म इसी पर आधारित थी.

22          हिन्दी सिनेमा मे विभाजन की  त्रासदी 

  देश का विभाजन किसी विध्वंश से कम नहीं है | अपने ही देश के नेताओं कि जल्दबाज़ी और भूलों के परिणाम के रूप मे विभाजन सामने आया | इस विभाजन का कारक ब्रिटेन था मगर कारण कांग्रेस और मुस्लिम लीग  के नेता थे |
स्थानान्तरण और पुनर्वास के बीच लाखों जिंदगियाँ इतिहास कि इस भूल से रौंदी  जाएगी और लाखों दिलों से निकली आह आधी सदी के बाद भी समाज को टीसती रहेगी, देश दर्द तो महसूस करता रहेगा मगर कभी उस घाव का इलाज नहीं करेगा जो धीरे धीरे आतंकवाद का रूप ले लेगा |
विभाजन की त्रासदी पर ढेर सारा साहित्य लिखा गया किन्तु फ़िल्मकारों ने विभाजन के प्रति वाइस चिंता और छटपटहट नहीं दिखाई |
दीपा मेहता की अर्थ 1947 और डॉ चन्द्र प्रकाश द्विवेदी कि पिंजर विभाजन कि त्रासदी पर ही बनी है | 1949 मे फिल्म लाहौर , 1961 धर्मपुत्र, 1973 गरम हवा, तमस  जैसी फिल्मे विभाजन कि त्रासदी पर बनी बताई तो जाती है पर साहित्यकारों द्वारा लिखे गए साहित्य जैसी प्रतीत नाही होती |
पाकिस्तानी मेल, गदर, शहीद-ए-मुहब्बत बूटासिंह जैसी फिल्मे विभाजन कि सच्ची कहानी कहती कम बल्कि विभाजन मे बिछड़े प्रेमियों कि ज्यादा लगती है |  फिल्म समीक्षक अजय ब्रम्हत्ज्म अभी तक कि फिल्मों मे पिंजर को विभाजन कि त्रासदी पर बनी फिल्मों का एक अच्छा प्रयास मानते  है
चूँकि देश का बँटवारा धर्म के आधार पर हुआ था इसलिए बँटवारे के बाद जो नफरत फैली वह धार्मिक ही थी। शायद हमारे फिल्मकार बँटवारे के कटु यथार्थ को विषय बनाने में डरते होंगे ताकि कोई समुदाय नाखुश न हो जाए। अतीत के गहरे जख्म को हरा करने की साहस न कर पाते होंगे। इस विषय पर लंबे समय तक हमारे फिल्म जगत में शून्यता रही। 1973 में एम0एस0 सथ्यू ने गर्म हवाबनाकर इस खालीपन में मजबूती के साथ दस्तक दिया। गर्म हवामें विभाजन के बाद ऊपजे संकट से विभिन्न सवालों को उठाया गया। आखिर कोई मुसलमान अपना वतन छोड़कर पाकिस्तान क्यों जाए। केवल स्थान की बात नहीं है बल्कि रोजगार, व्यवसाय, घर, माटी, समाज सबको एक साथ इसलिए छोड़ दे कि वह मुसलमान है?

 23 स्वाधीनता आंदोलन और हिन्दी गीत


     इसके बाद फिल्म नास्तिक मे देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान कितना बदल गया संसार गाना था |

फ़िल्म का इतिहास ( भाग-1 उत्तर आधा भाग भाग -2 में पड़े )


भाग -1  
(पूरा अपलोड नहीं हो पा रहा था ज्यादा बड़ा होने के कारण  भाग-2 अगले में देखें ...............................)


फ़िल्म का इतिहास

1. फिल्म थ्योरी (सिद्धान्त) 

संचार क्या है ?
संचार किन चरणों में होता है ?
किसी संचार का प्रभाव उसके प्रापक पर तत्काल पड़ जाता है या उसमे वक्त लगता है?
किसी संदेश को अगर किसी माध्यम के जरिये भेजा जाये तो क्या सचमुच वह टार्गेट दर्शक/श्रोता तक पहुँच जाता
इन सभी सवालो को लेकर कई शोध हुए और कई अवधारणा सामने आई
संचार के तीन चरण हो सकते है 
एक चरणीय संचार (वन स्टेप फ्लो) बुलेट थ्योरी
द्वि चरणीय संचार (टू स्टेप फ़्लो) ओपिनियन लीडर
बहु चरणीय संचार (मल्टी स्टेप फ्लो) डिफ्यूजन ऑफ इनो

2. बुलेट थ्योरी 

इसे शक्तिशाली प्रभाव का सिद्धान्त या हाइपोडर्मिक निडल थ्योरी कहा जाता है |
संचार के प्रारम्भिक विद्वानो के अनुसार जनसंचार माध्यम इतने ज्यादा शक्तिशाली एवं प्रभावी होते है कि वें लोगो के विचारों को अपनी इच्छानुसार बदल सकते है

वाटर लिपमैन 1922 मे अपनी किताब पब्लिक ओपिनियन मे लिखते है कि हम जो विश्व देखते है, वह वास्तविक विश्व नहीं होता, बल्कि हम अपने मस्तिस्क मे मौजूद उसकी तस्वीर देखते है | यह तस्वीर वह नहीं होती जो हमने स्वयम महसूस की है ,बल्कि इस तस्वीर का का निर्माण मीडिया द्वारा किया जाता है ’ |
उदाहरण 
The magic Bullet Theory:-
Mass media----Public

मेंडेलसन 1973 ने सुरक्षित ड्राइविंग करने तथा शराब पीकर गाड़ी न चलाने के संदेश पर आधारित फिल्म बनाकर उसका प्रदर्शन किया उसे 35000 दर्शको ने देखा | मेंडेलसन के अनुसार फिल्म का दर्शकों पर सकारात्मक और ज्यादा अच्छा तथा व्यापक असर पड़ा  |
बुलेट थ्योरी वस्तुत: एक सरलीकृत अवधारणा है | इससे माना गया है  कि लोग निस्क्रिय होते है,उनके पास अपनी समझ नहीं होती ,वे मीडिया (सभी माध्यम ) द्वारा परोसी गयी चीजो को बिना सोचे विचारे बिना शर्त ग्रहण कर लेते है 1

3. कल्टीवेशन थ्योरी 

जार्ज गर्बनर ने 1976 मे टेलीविज़न कार्यक्रमों के प्रभाव के शोध के आधार पर इस सिद्धान्त की नींव रखी |
इसकी मूल परिकल्पना यह थी कि टेलीविज़न कार्यक्रम या फिल्में देखने से हम सामाजिक जगत की प्रकृति के संबंध में जिस प्रकार की धारणा हम बनाते है वह विकृत होती है |
गर्बनर ने इस शोध के लिए दर्शकों को दो हिस्सो मे बांटा अत्यधिक टीवी देखने वाले और कम देखने वाले
शोध मे नतीजा यह निकला कि दर्शक प्रतिदिन औसतन 4 घंटे टीवी देखता है | ज्यादा टीवी देखने वाला समूह इससे भी ज्यादा देखता है |
कम और ज्यादा टीवी देखने वालो के ऊपर जनसंचार के प्रभाव मे अंतर आया  |
ज्यादा टीवी देखने वालो कि दृष्टि मे वास्तविक जगत की  छवि टेलीविज़न की  छवि के ज्यादा करीब थी |
उदाहरण के लिए :- अमेरिका मे विश्व की मात्र 6 % आबादी निवास करती है | लेकिन ज्यादा टीवी देखने वालो की नज़र यह संख्या काफी अधिक थी | क्योकि वे टीवी कार्यक्रमों मे ज़्यादातर अमेरिकन लोगो को ही देखते थे |
4. स्पाइरल ऑफ साइलेंस 

जर्मनी की एलिज़ाबेथ नोयल न्यूमेन ने  1973 में स्पाइरल ऑफ साइलेंस की अवधारणा प्रस्तुत की थी |
इसके अनुसार किसी विवादित्त मुद्दे पर अगर समाज कई प्रकार के मतो मे विभाजित हो, तो अल्पमत से जुड़े लोग अपना पक्ष खुलकर या जोरदार तरीके से नहीं रख पाते |
उनकी इसी चुप्पी से बहुमत के लोगो को और बढ़ावा मिल जाता है | वे और ज़ोर ज़ोर से बोलना  शुरू करते है | इससे अल्पमत की आवाज और भी ज्यादा दब जाती है |
इस प्रक्रिया मे ऐसा लगने लगता है कि उस मुद्दे पर कोई विरोधी विचार है ही नहीं|
शिकागो विश्वविद्यालय कि अतिथि अध्यापिका श्री मती एलिजाबेथ बताती है कि जनसंचार माध्यम तीन रूपो मे अपनी भूमिका निभाते है |
यह बताते है कि समाज मे कौन से विचार प्रमुख और हावी है
यह बताते है कि कौन सा विचारआगे बढ़ रहा है
किस विचार के साथ रहने पर आप अलगाव से बच सकते है

उदाहरण के लिए किसी विवादित फिल्म (अंजुमन,विश्वरूपम,पाँच, ओह माई गॉड,एम एस जी ) पर अलग अलग राय होना फिर बहुमत की बात को ही व्यापक प्रसारित करना .................... 

  5.  विश्व सिनेमा 

दशको पहले विश्व सिनेमा से भारतीय दर्शक का इतना भर परिचय था कि हॉलीवुड के बड़े स्टार्स के प्रेम सबन्ध और स्केण्डल अखबारों मे जगह पा जाते थे या कुछ बड़ी फिल्मों के नाम सुनाई पड़ते थे | मुंबई जैसे महानगरो मे प्रभात चित्र मंडली जैसी फिल्म सोसाइटियाँ थी जो दुनिया के बेहतरीन सिनेमा को  समारोहो मे दिखाती थी | लेकिन इन्टरनेट के आने से अब स्थिति बदली है | विश्व सिनेमा अब भारतीय दर्शको के जीवन का कोना बन चुका है | विश्व सिनेमा आज विश्व संस्कृति का नुमाइंदा है | सारी दुनिया आज वैश्विक नागरिकता तलाश रही है |
विश्व साहित्य कि शायद ही ऐसी कोई कृति हो जिस पर बेहतरीन फिल्म न बनी हो | गोन बिद द विंडडॉ ज़िवागोअन्न कारेनिनाले मिज़राबेलवॉर एंड पीस से लेकर मार्खेज के लव इन द टाइम्स ऑफ कालरा  जैसी फिल्में बनी है |
विश्व सिनेमामानव ह्रदय का विशाल दर्पण है | हम उदारीकरण के युग मे जी रहे है | भारतीय अपने शहरो के सिनेमा घरों और टीवी पर जिस हॉलीवुड के सिनेमा को अब अपने देश मे भी हिट बनाने लगे हैउससे थोड़ा हटकरउससे थोड़ा व्यापकउससे थोड़ा गहरा है विश्व  सिनेमा |
 6.  इतिहास

फिल्म की तरह कोई और कला हमारे अंतर्मन तक नहीं जाती और ये सीधे हमारी भावनाओं तक जाती है बिलकुल गहरे,हमारी आत्माओं मे अंधेरे कमरो तक :- इंगमर वर्गमैन
फिल्में ऑडियो विजुअल नशा बनाने वाली मशीन है :- महेश भट्ट
फिल्में हमेशा ढोंग होती है और फ़िल्मकार से बड़ा कोई ढोंगी नहीं :- जॉन मिलियस
फिल्म रण भूमि है :- सेम फुलर
ये कुह विचार उन फ़िल्मकारों के है जो सिनेमा का सपना देखते है सोचते है जीते है बनाते है और उस सपने को हमारे फिल्म के रूप मे प्रस्तुत करते है | हमारे यानि उन करोड़ो करोड़ दर्शकों के सामने जिनके लिए भी सिनेमा नशा है, एक सपना है जिसे वे खुली आँखों से देखते है |  •सिनेमा के इतिहास को सिर्फ एक खोज कह कर परिभाषित नहीं किया जा सकता या थॉमस एडिसन और ल्युमियर बंधुओं द्वारा खोजी गयी एक तकनीक कहकर छुटकारा भी नहीं  पाया जा सकता | सिनेमा का विकास तकनीक शृंखलाओं तथा व्यवसायियों के संयुक्त प्रयासो का परिणाम है जो विश्व पटल पर 1890 मे उभर कर आया |
    •सिनेमा के पर्दे जो हमे दिखता है वह उस समय या बहुत पहले किसी नियत स्थान और समय पर घटित घटनाओं की रिकार्डिंग होती है | सिनेमा का क्रमिक विकास हुआ है और आज का सिनेमा अनेक लोगो की सृजनात्मक सोच और कलात्मक प्रयासो का नतीजा है |
    •सिनेमा फ्रांस की देन है | स्थिर छाया चित्रों के आविष्कार के बाद 1850 मे फ्रांस के गाइस्पोर्ड फेलिक्स टारनाकॉन ने उन दिनों प्रकाशित फ्रांसीसी कथाओं, लेखो,और व्यंगों का उपयोग छायाचित्रों के माध्यम से शुरू किया | उन कथाओं का रेखा चित्र बना कर छाया चित्रों मे तब्दील कर एक नरेटर के साथ मिला कर मंच पर उसका प्रदर्शन किया |

      •अपने इस प्रयास से मिली प्रसिद्धि से उत्साहित होकर फेलिक्स ने 1857 मे एक और अनोखा प्रयोग किया एक बड़े हवा मे उड़ने वाले गुब्बारे मे कैमरे के साथ खुद के बैठने का इंतजाम करखेत खलिहान , नदी, तथा प्राकतिक दृश्यों का छायांकन किया |
     •1873 मे फ्रांस के एक और कल्पना शील छायाकार पेरे जूल्स सीजर जांसेन ने एक अद्भुत कैमरे का निर्माण किया जिसे बाद मे फोटोग्राफिक राइफल्स के नाम से जाना गया | इसमे माध्यम से उन्होने 1874 मे जब शुक्र गृह सूर्य के सामने से गुजरने वाला था , उस अनोखे समय कॉ उन्होने 72  सेकेंड मे 48 चित्रों का छायांकन किया

    •फ्रांस के ऐसे कई प्रयोगवादी और सृजनात्मक छायाकारों द्वारा सिनेमा का स्वरूप कदम दर कदम उभरने लगा था | लेकिन मुख्यत: फ्रांस के लुईस ल्यूम्येर को ही सिनेमा के जन्मदाता के रूप मे मान्यता मिली है | व्यापार क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा के बावजूद फ्रांस के लियोन गोमोन्ट, अंटोनी और लुईस ल्यूम्येर आपस मे दोस्त भी थे और इन तीनों ने मिलकर लि अरोजेर आरोजनामक प्रथम कथा फिल्म का निर्माण कर इसे 22 मार्च 1895 के दिन प्रदर्शित करके विश्व सिनेमा के क्षेत्र मे नई क्रांति का सूत्रपात किया | लोगो ने इस फिल्म को टिकट खरीद देखा और काफी प्रसंसा की |
     •इसके बाद 28 दिसंबर 1895 को पेरिस मे ल्युमियर बंधुओं ने और प्रयोग किए  इस बार स्टेशन पर आती रेलगाड़ी,फैक्ट्री से निकलते मजदूर,बगीचे में पानी देता माली,नाश्ता करता बच्चा जैसी 8 फिल्में बनाई |
     •फ्रांस ने सिनेमा की शुरुआत का श्रेय भले ही ले लिया हो पर जर्मनी,इंगलैंड इटली, और अमेरिका में भी इस सिलसिले मे प्रयोग चल रहे थे |
     •पहले प्रदर्शन के तुरन्त बाद ल्युमियर बंधुओं ने एक जैसे 25 उपकरण बना डाले | सिनेमटोग्राफ नाम का यह उपकरण एक साथ तीनों काम करता था |
     •जैसे गतिशील दृश्यों को अंकित करना,उनकी प्रोसेसिंग करना और बाद मे बड़े पर्दे पर प्रोजेक्ट करना |
     •उधर टॉमस अल्वा एडिसन काइनेटोस्कोप पर काम कर रहे थे | यह एक ऐसा उपकरण था जो शायद लुमियर ब्रदर के सिनेमोटोग्राफ के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा की वजह बन सकता था |
      •एडिसन का काइनेटोस्कोप दरवाजे के की हॉल से किसी के कमरे मे छुप कर झाँकने जैसा था | जबकि ल्युमियर ब्रदर ने प्रोजेक्टर की मदद से बड़े पर्दे पर दिखाना शुरू किया |
     •इस प्रभावों का चरम 1903 मे आई फिल्म द ग्रेट ट्रेन रोबरी मे देख सकते है जब एक डकैत अपनी बंदूक सीधे कैमरे की तरफ करके गोली चलाता है | इसे शायद सिनेमा के इतिहास के सबसे प्रभावशाली क्लोजअप मे गिना जाएगा वह इतना असरदार था की जो लोग उस फिल्म को देख रहे थे वो गोली से बचने के लिए इधर उधर भागने लगे थे |
     •दो दृश्यों को जोड़ने का सफल प्रयोग राबर्ड डब्लू पॉल की फिल्म कम अलोंग डू : मे देखने को मिलता है | पूरी फिल्म मे दो दृश्य है पहले मे उम्रदराज पति पत्नी एक कला प्रदर्शनी के बाहर नज़र आते है तथा दूसरे दृश्य मे वे प्रदर्शनी के भीतर नज़र आते है
    •उधर ल्युमियर ब्रदर की 6 मूक फिल्मों का प्रदर्शन 7 जुलाई 1896  को मुंबई के वाटसन होटल मे हुआ था | इसमे इंट्री ऑफ सिनेमेटोग्राफ, फिर एराइवल ऑफ ट्रेन,द सी बाथ ,ए डिमोलिशन,वर्कर्स लिविंग द फैक्ट्री, और लेडीज एंड सोल्जर्स ऑन व्हील्स प्रमुख थी | इस प्रदर्शन  मे सिर्फ  आमंत्रित मेहमान  ही थे | 1901 तक उनके पास करीब 100 फिल्मों का संग्रह हो चुका था |
     •इस प्रदर्शन के 14 सप्ताह बाद मुंबई के नावेल्टी हॉल मे उन मूक फिल्मों का प्रदर्शन आम लोगो के लिए किया गया इसी प्रदर्शन मे मुंबई के छायाकार हरिश्चंद्र सखाराम भतवेडकर भी थे | लोग इन्हे सेव दादा के नाम से जानते थे |  •एडिसन मुख्य रूप से ध्वनी आधारित सिनेमा पर काम कर रहे थे | इस सोच को मान्यता तब मिली जब 1927 मे द जैज सिंगर रिलीज हुई |
      •1929 मे जर्मन मे बनी आई किस यूअर मदाम यूरोप की पहली संवाद बोलती फिल्म थी |
     •सोवियत संघ मे पहली बोलती फिल्म 1931 मे प्रदर्शित हुई द रोड टू लाइफ या ए स्टार्ट इन लाइफ
     •1920 और 1930 मे जापान अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा फिल्मे बना वाला देश बना  जापान मे भी पहली बोलती फिल्म (सिंक संवादयुक्त) the neighbour wife and mine  थी |  
     •एडविन एस पोर्टर अमेरिका मे फिल्म निर्माण का कार्य कर रहे थे | इन्हे फिल्म संपादन का जनक भी कहा जाता है |
     •1899 मे एडिसन की प्रयोगशाला मे से जुड़े | इससे पहले वो एक बिजली मिस्त्री थे |और 1903 मे इन्होने लाइफ ऑफ एन अमेरिकन फायर मैन और द ग्रेट ट्रेन रोबरी का निर्माण किया |
     •1920 आते आते फ्रांसीसी सिनेमा मे दो बड़े महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए | पहला इस समय फिल्म की कथावस्तु मे ऐतिहासिक गाथाओं व साहित्यिक विषय वस्तु को आधार बनाया गया, दूसरा 20वीं सदी के अंतिम दशक मे बोलती फिल्मे बनने लगी  |
    •1927 मे नेपोलियन नाम की फिल्म हिट ब्लॉकबस्टर  रही | यह फिल्म नेपोलियन बोनापार्टा के जीवन पर आधारित थी | जो छह घंटे की मूक फिल्म थी |
    •फ्रांसीसी फिल्म द फॉल ऑफ द हाउस ऑफ अशर 1928 एक ऐसी स्त्री की कहानी थी जिस पर बुरी आत्मा का साया था | द फैशन ऑफ जॉन ऑफ ओर्क 1928 मे बनी 1412 मे एक किसान के घर जन्मी महान योद्धा की कहानी कहती है | जो लगातार फिल्मों के विषय बदलते हुए हमे दिखते है
     •हरिश्चंद्र सखाराम भतवेडकर ने ल्युमियर की  फिल्मों से प्रभावित होकर ल्युमियर ब्रदर की मदद से सिनेमेटोग्राफ कैमरा खरीदा | सेव  दादा को फिल्मों के प्रति इतनी दीवानगी बढ़ी की उन्होने 1896 मे ही एक कुश्ती की प्रतियोगिता के कुछ दृश्यों को छायांकन करके भारतीय जनता को दिखाया |
      •1886 भारतीय सिनेमा के इतिहास में वह अमर दिन था , जिस रोज मुंबई (पूर्व नाम बंबई) के वाटकिंस हॉटल में ल्युमेरे ब्रदर्स ने 6 लघु चलचित्रों (शार्ट फिल्म) का प्रदर्शन किया था। ये फिल्में ध्वनिरहित थी लेकिन इसके बाद भी फिल्मों ने दर्शकों का मनोरंजन किया। इन लघु चलचित्रों से प्रभावित होकर श्री हरिश्चंद्र भटवडेकर और श्री हीरालाल सेन नामक व्यक्तियों ने ल्युमेरे ब्रदर्स की तरह क्रमशः मुंबई और कोलकाता (पूर्व नाम कलकत्ता) में लघु चलचित्रों का निर्माण प्रारंभ कर दिया। 1898 में हीरा लाल सेन द्वारा निर्देशित ‘The Flower of Persia’ भारत की पहली लघु चलचित्र थी . सन् 1899 मे श्री भटवडेकर ने लघु चलचित्र बनाने में सफलता प्राप्त की।  
     •इसके बाद मुस्लिम परिवार में जन्में और पेशे से विद्युत अभियंता एफ बी थाना वाला भी चलचित्र की ओर आकर्षित हुए | फिर बाद मे उन्होने अपना पेशा छोड़ सन 1900 मे मुंबई के आस पास के दृश्यों का छायांकन कर स्पेंडिड न्यू व्युज ऑफ बॉम्बे नाम से चलचित्र का निर्माण कर लोगो के समक्ष प्रस्तुत किया |
     •विदेशी लोगो द्वारा भारत मे की गयी शूटिंगकोकोनट फेयर,ओवर इंडियन एम्पायर और पैनोरमा ऑफ इंडियंस सींस जैसे कई मूक चलचित्र प्रचिलित हुए |
     •1897 से लेकर 1912 तक फिल्मांकन किए गए चल चित्रों को अगर हम देखे तो यह कह सकते है की ये चलचित्र मात्र घटनाओं और छोटे बड़े समारोहों की रिकॉर्डिंग के अतिरिक्त कुछ नहीं थे
     •हीरा लाल सेन जो बंगाल के कई नाटकों के मंचन के दौरान फिल्मांकन कर इसे जगह जगह प्रदर्शित कर रहे थे लेकिन उन्हे सफलता नहीं मिली | जो सफलता मुंबई के रामचंद्र गोपाल टोरने को  18 मई 1912 मे उनकी फिल्म पुंडलीक से मिली | यह फिल्म महाराष्ट्र के हिन्दू संत के जीवन पर आधारित रामाराव कीर्तिकर द्वारा लिखित नाटक पर आधारित थी | | यह फिल्म आर जी टोरने और एन जी च्छितरे की संयुक्त फिल्म थी |
     •यह भारत की पहली कथा फिल्म थी जिसमें कलाकारों ने इस फिल्म के लिए विशेष रूप से अभिनय किया | |
     •इस फिल्म का छायांकन विदेशी छायाकार द्वारा किए जाने के कारण शायद इसे भारत की पूर्ण स्वदेशी फिल्म का दर्जा और सम्मान नहीं मिल पाया |
    •दुनिया की पहली कथा फिल्म क्वीन एलिज़ाबेथ  का निर्माण 12 जुलाई 1912 को अर्थात पुंडलीक से लगभग दो महीने बाद फ्रांस मे हुआ
    •पुंडलीक फिल्म के एक वर्ष बाद दादा साहब फाल्के ने राजा हरिश्चंद्र फिल्म बनाई | दादा साहब फाल्के का जन्म नासिक के एक गाँव त्रिम्ब्केश्वर के ब्राह्मण परिवार मे 1870 मे हुआ था  | इनका पूरा नाम धुढीराज गोविंद फाल्के था जो बाद मे सिनेमा जगत ने दादा साहब के नाम से उन्हे परिभाषित किया
      •दादा साहब ने 1890 मे रतलाम मे उन्होने थ्री कलर ब्लॉक मेकिंग फोटोग्राफी  सीखा |और एक नाटक मंडली मे छायाकार और चित्रकार की नौकरी करने लगे | यही काम करते करते वो एक जर्मन जादूगर के संपर्क मे आए और जादू के कई हूनर सीखे |
      •1911 मे उन्होने द लाइफ ऑफ क्राइस्ट नाम की विदेशी फिल्म देखी  और निश्चय किया की वो भगवान कृष्ण के जीवन पर फिल्म बनाएँगे | लेकिन फिल्म निर्माण की बारीकियाँ उन्हे न मालूम होने की वजह से वो इंगलैंड चले गए |
      •पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होने अपने खरीदे कैमरे से उन्होने चने के अंकुरित बीज से पौधा बनने की प्रक्रिया को प्रतिदिन एक शॉट लेते हुए एक महीने मे पूरा किया |
     •फिल्म का नाम द बर्थ ऑफ पी प्लांट रखा और प्रदर्शित भी किया | यह भारत की पहली स्वदेशी अनुदेशीय(instructional) फिल्म के तौर पर जानी जाती है
      •   फिर दादा साहब ने कथा फिल्म बनाने की सोची | भगवान कृष्ण की जीवनी पर फिल्म बनाने का इरादा छोड़ दिया था और राजा हरिश्चंद्र नाम की  फिल्म बना उन्होने हिन्दी सिनेमा की पूर्ण स्वदेशी कथा फिल्म का इतिहास लिखा |
    •फिल्म के लिए दादा साहब ने मुंबई मे छोटा सा स्टुडियो स्थापित किया | और वही उस फिल्म की पटकथा लिखी | फाल्के इस फिल्म मे हरिश्चंद्र की पत्नी के रूप मे किसी महिला को लेना चाहते थे पर पर उन दिनो महिलाओ की सामाजिक स्थिति ऐसी  नहीं थी की वो कैमरे के सामने प्रदर्शन करे | मजबूरी मे उन्हे एक रसोइयाँ पीजी साने से ही यह रोल कराना पड़ा और आखिर कार 2 मई 1913 को मुंबई के कोरोनेशन थियेटर मे इस फिल्म का सार्वजनिक प्रदर्शन किया गया
   •यह फिल्म मात्र 15000 रूपए  मे बनी थी  
   •फिल्म की कहानी धार्मिक होने की वजह से भी लोगो ने खूब सराहा |
  •राजा हरिश्चंद्र सिर्फ 4 रील की फिल्म थी और लंबाई 3700 फीट थी |
   •फिल्म हिन्दी और अङ्ग्रेज़ी दोनों भाषाओं मे थी |
    •1917 मे दादा साहब ने दो और कथा फिल्म बनाई | पहली कृष्ण जन्म और दूसरी लंका दहन |
1913 से लेकर 1931 तक फिल्मों का मूक दौर था | इस दौरान 1917 मे दादा साहब ने सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के नाम से दूसरी फिल्म बनाई | हालांकि यह फिल्म पहले की तुलना मे छोटी थी |
इनकी फिल्म भस्मासुर मोहिनी (1913) सत्यवान सावित्री, भी थी |
इसके बाद फाल्के ने हिंदुस्तान फिल्म कंपनी के मुख्य निर्माता के तौर पर 1वापसी की | इस बैनर  के तले उन्होने छोटी बड़ी लगभग 93 फिल्मों का निर्माण किया जिसमे से 40 फिल्म मे वो मुख्य रूप से शामिल थे |
•1918 मे कृष्ण जन्म, 1919 मे कालिया मर्दन, 1921 मे संत तुकाराम,1922 मे बनी संत नामदेव, 1926 मे बनी संत एकनाथ और भक्त प्रहलाद मुख्य रूप से प्रचिलित हुई |
उन्होने अपने जीवन मे एकमात्र सवाक फिल्म 1937 मे कोल्हापुर सिनेटोन  कंपनी के बैनर तले बनाई | जिसका नाम था गंगावतरण
और 1944 मे दादा साहब ने आखिरी साँसे ली |
मूक युग 1934 तक चलता रहा | इस दौरान कुल 1288 फिल्मे बनी | किन्तु इनमे से 13 फिल्में ही राष्ट्रीय अभिलेखागार  मे  उपलब्ध है | उनमे से दादा साहब की कालिया मर्दन,राजा हरिश्चंद्र,कृष्ण जन्म, तथा लंका दहन, हिमांशु रॉय की प्रेम सन्यास, सिराज और प्रपंच पाश, जीपी पवार की दिलेर जिगर,और गुलामी का पाटन, हरीलाल एम भट्ट की पित्र प्रेम, पी एन राव की मर्टाड वर्मा और भक्त प्रह्लाद और संत तुकाराम ही है
इनके अलावा और भी लोग इस दिशा मे सक्रिय थे ........  
गुजरात के दिहोर मे 1904 मे जन्मे शंकरलाल जे भट्ट ने आठ हजार रुपये मे 1925 मे 1925 मे दिल्ली नो डौड चेटल बनाई | जो गुजरती मे थी | और फियरलेस फेंटम  हिन्दी मे बनाई |
इसके बाद चंदु लाल शाह ने अब तक बन रही एक ही धारा की फिल्मों से हट कर नई धारा को अपनाया | वो फिल्म फेडरेशन के अध्यक्ष तथा सेंसर बोर्ड के प्रथम मेम्बर भी रहे | इनको फिल्म उद्योग का सरदार भी कहा जाता था | इनहोने नारी को अपनी आज़ादी के लिए संघर्ष विषय पर कई फिल्मे बनाई जिनमे विश्व मोहिनी,गृह लक्ष्मी,चन्द्र मुखी,और राजलक्ष्मी मुख्य थी | चंदु लाल शाह हिन्दी सिनेमा उद्योग को अब तक सबसे ज्यादा फिल्मी सितारे देने वाले व्यक्ति माने जाते है राजकपूर, दिलीप कुमार,नर्गिस,नूतन,देवानन्द,किशोर कुमार,मोतीलाल,के एल सहगल,आगा मधुबाला,मीना कुमारी, सुरैया, आदि |
फिल्मों के निर्माण के साथ साथ प्रदर्शन के क्षेत्र मे भी प्रयास किए जा रहे थे 1902 मे जे एफ मदान ने एक फ्रांसीसी कंपनी से प्रोजेक्ट और फिल्म प्रदर्शन से संबन्धित अन्य उपकरण खरीदे तथा कलकत्ता मे अस्थायी सिनेमाघर बना कर फिल्मों का प्रदर्शन आरंभ किया | इनहोने ही पहला स्थायी सिनेमा घर 1907 मे मुंबई  मे स्थापित किया था  | नाम था एल्फ़िस्टन पिक्चर पैलेस |
बाबू राव पेंटर ने 1912 मे अपना खौद का स्टुडियो खोल दिया | वे खुद पेंटर थे और दादा साहब के कला विभाग मे बच्चो की वेषभूषा तैयार करते थे |
•1914 के आस पास उन्होने एक बिलियम्स कैमरा खरीदा | भले ही वह काम नहीं करता था |  3 साल उस कैमरे को ठीक करने मे लगाया |फिर 1917 मे आनद राव, विष्णु गोविंद, सैयद यासमीन फट्टेलाल के साथ मिलकर कोल्हा पुर मे महाराष्ट्र फिल्म कंपनी की स्थापना की और सौरंध्री फिल्म बनाई | इनके स्टुडियो मे आग लग गयी सिर्फ कैमरा बचा | फिर इन्होने 1925 मे अति यथार्थ वादी फिल्म सावकारी पास बनाई |
शुरुआत मे हर साल लगभग 8 फिल्मे बनती थी जो 1920 तक आते आते 40 तक पहुँच गयी | इस दौर मे धार्मिक और पौराणिक आख्यानों पर ही केन्द्रित फिल्मे बनती थी और फिल्मों का केंद्र मुंबई रहा |
इन सबके बाद 1931 मे आर्देशिर ईरानी ने पहली सवाक फिल्म बनाई | नाम था आलम आरा |
इस फिल्म को मुंबई के माइजीस्टिक सिनेमा हॉल मे दिखाया गया | फिल्म जोसेफ डेविड के नाटक आलम आरा पर आधारित थी | फिल्म मे कई गाने थे, फैटेसी थी, मनोराञ्जन था तथा कमाई के अनुमान मे काफी ज्यादा थी | फिल्म की नायिका जुबैदा थी तथा नायक प्रथ्वीराज चौहान थे | | फिल्म एक बेवफा पत्नी की कहानी कहती है |
अमेरिकी बोलती फिल्म द जैज सिंगर के बाद दूसरी फिल्म आने मे साल भर से ज्यादा समय लगा |
भारत मे 1931 मे आलम आरा के आने के बाद इंपीरियल कंपनी ने  एक साल के अंदर चार और फिल्मे बना ली |इ सी कंपनी ने पहली सामाजिक मुद्दे पर फिल्म बनाई दौलत का नशा | 1931 से 32 तक इसी कंपनी ने 11 बोलती फिल्मे बनाई तथा दूसरी ओर एक और कंपनी मदन थियेटर ने 24 बोलती फिल्मे बना ली थी |  



 7. चौथा दशक 

चौथे दशक मे बोलती फिल्मों का शुभारंभ हुआ | 1931 मे आलम आरा बनी | फिल्म मे 12 गाने थे | लंबाई 10हजार, 500 फुट थी | जिस्म सेंसर नंबर 10043 था |
मुख्य पत्र मास्टर बिट्ठल, जुबैदा, पृथ्वी राज चौहान, व जगदीश सेठी तथा गायक (बाज़िर मोहम्मद खान थे) | 1931 मे 27 फिल्मे बनी जिनमे 22 हिन्दी तथा शेष पाँच बंगला,तमिल टेलगु तथा अङ्ग्रेज़ी मे थी |
इसी साल की एक अन्य फिल्म लैला मजनू थी | जिसमे 24 गाने थे |
इस दशक मे बाबू राव पेंटर,बरुवा,दामले,भालजी पेनधरकर, सोहराब मोदी,फट्टेलाल,वी शांता राम जैसे लोगो ने फिल्मे बनाई | सैरंध्री देश की पहली रंगीन फिल्म थी पर प्रोसेसिंग सही से न हो पाने की वजह से किसान कन्या को पहली रंगीन फिल्म माना जाता है |
इसी दशक मे अछूत कन्या,देवदास, पुकार, बनी |
•1933 मे देश की पहली अङ्ग्रेज़ी बोलती फिल्म कर्मा की शूटिंग इंग्लैंड मे हुई | जिसके निर्माता और अभिनेता हिमांशु रॉय और अभिनेत्री देविका रानी थी |
इस दशक की उल्लेखनीय फिल्मों मे मेरी जान,यहूदी की लड़की, चन्द्र सेना,भिखारी,खून का खून,अलहिलाल,औरत,नदी किनारे,जय स्वदेश,नई दुनिया,अनरकली,सपेरा,हंटर वाली
कुल मिलकर इस दशक मे 1823 फिल्मे बनी जिमसे 312 मूक थी |
8. पांचवा दशक
 •इस दशक मे होमी वाडिया,बाम्बे टाकीज़,प्रभात टाकीज़,जैसी फिल्म कंपनियों ने अच्छी फिल्मे बनाई | सिकंदर,पड़ोसी,सर्कस कन्या किस्मत,अलबेला,आनंद मठ, नया संसार, शाहजहाँ,प्यार की जीत,जिद्दी, पतंगा,बाबुल इत्यादि |
फिल्म जगत एकता और सौहार्द की एक मिशाल है कैसे ? देश की पहली मूक फिल्म बनाने वाले दादा साहब मराठी भाषी, पर्दे के पीछे बैठ कर संगीत देने वाले द्वारका दास गुजराती,प्रथम बोलती फिल्म बनाने वाले फारसी | तो प्ले बैक व गायन की शुरुआत करने वाले नितिन बॉस व के डी बोस बंगाली थे
•1941 मे हिन्दू मुशलिम एकता पर पहली फिल्म बनाई | नाम था पड़ोसी |
इस दशक मे अभिनेता शोहरब मोदी,रंजन ,गजानन,गुरुदत्त,कमाल अमरोही,त्रिलोक कपूर, राजकपूर, उदयशंकर मुख्य रूप से थे तो अभिनेत्रियों मे बीना,तबस्सुम,रेहाना,मनोरमा,उमा देवी,मीना कुमारी,उषा किरण,माधवी, नर्गिस,निरुपा रॉय,बैजानती माला, दुलारी मुख्य थी |
गायकों मे मोहम्मद रफी , किशोर कुमार, पंकज मालिक, तलत महमूद,और मन्ना डे प्रमुख थे |
• गायिकायों मे सुरैयाराज्कुमारी,नूरजहान,लता मंगेशकर,ज़ोहरा बाई प्रमुख थी
अब फिल्मे बाहर भी दिखाई जाने लगी डा कोटनिस की कहानी को वेनिस समारोह मे दिखाया गया | ख्वाजा अहमद अब्बास की धरती के लाल को 1949 मे मास्को मे प्रदर्शित किया गया |
इस दशक मे 2000 फिल्मे बनी
9. शताब्दी की कुछ प्रमुख फिल्में (अवाक)
•1913 :- राजा हरिश्चंद्र
•1914 :- भस्मासुर मोहिनी
•1915-16 :- प्रथम विश्व युद्द के कारण नहीं बनी
•1918 :- कृष्ण जन्म
•1919 :- कालिया मर्दन
•1920 :- शकुंतला
•1921 :- तुकाराम,इंग्लैंड रिटर्न
•1922 :- सुकन्या सावित्री
•1923 :- भक्त विदुर
•1924 :- काला नाग
•1925 :- काया पलट, पित्र प्रेम
•1926 :- बंदे मातरम, भक्त प्रह्लाद
•1927 :- देवदास, नेता जी पालकर
•1928 :- श्री राज ,  थ्रो ऑफ डाइज़
•1929 :- स्वराज्य तोरण
•1930 :- मुहब्बत के आशु
10. शताब्दी की कुछ प्रमुख फिल्में (सवाक)
•1931 :- आलम आरा
•1932 :- अयोध्या का राजा , जिंदा लाश , इंद्रा सभा,
•1933 :- पूरन भगत, यहूदी की लड़की सती सीता
•1934 :- चंडी दास, अमृत मंथन,
•1935 :- देवदास, धूप छांव
•1936 :- अछूत कन्या अमर ज्योति
•1937 :- प्रेसिडेंट, विद्यापति,
•1938:-  स्ट्रीट सिंगर
•1939 :- कपाल कुंडला, पुकार,आदमी,कंगन,
•1940 :- बंधन,औरत, नर्तकी, ज़िंदगी
•1941:- चित्रलेखा, डाक्टर, आदमी
•1942 :-- बसंत, भक्त सूरदास,खानदार,जमींदार
•1943 :- किस्मत,राजराज्य, शकुंतला,तानसेन
•1944:- रतन,चांद,ज्वार भाँटा,रामशास्त्री
•1945 :- आम्रपाली, गजल,हमराही,पहली नज़र ज़ीनत
•1946:- अनमोल घड़ी, डा कोटनिस की अमर कहानी
•1947 :- जुगनू,शहनाई,दर्द,नीलकमल,
•1948:- शहीद,मेला,चन्द्र शेखर, संत तुकाराम,आग खिड़की
•1949 :- अंदाज़,महल,एक थी लड़की,दिल्ली दुलारी,बाज़ार, बड़ी बहन, शबनम 

11. विश्व सिनेमा के कुछ प्रख्यात  निर्देशक

राबर्ट ब्रेसों (फ्रांसीसी)
इंगमार बर्गमैन (स्वीडन)
माइकल एंजेलो अंटोनियोनि (सोवियत)
फ़्रांकोइस रोनाल्डो (फ्रेंच)
सर्गेई आइन्स्टाइन (सोवियत )
जीगा वर्तोव
ज्यां लुक गोदार (फ्रांसीसी )
जफर पनाही (ईरान)
अकी

12. भारत के कुछ फिल्म निर्देशक

दादा साहब फाल्के
सत्यजीत राय
हीरालाल सेन 
हिमांशु रॉय
ख्वाजा अहमद अब्बास
सोहराब मोदी
बिमल रॉय
श्याम बेनेगल
अनुराग  कश्यप
केतन मेहता 



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