. फ़िल्म का इतिहास ( भाग-1 आप पड़ चुके है अब अगला भाग-2 उत्तर)
13 राबर्ट ब्रेसों
(फ्रांसीसी)
•इन्हे आध्यात्मिक शैली के लिए जाना
जाता है | जब फ्रांस मे नए सिनेमा की लहर चली तो उन्होने
इसमे खास योगदान ही नहीं दिया बल्कि एक अमित छाप भी छोड़ी |
•स्वीडिस निर्देशक गोदार्द कहते
इनके बारे मे कहते थे की जिस प्रकार रूस के उपन्यास कार दस्तोएव्स्की , जर्मन के संगीत कार मोजार्ट के बगैर अधूरा है उसी प्रकार फ्रांस के सिनेमा
की बात ब्रेसों के बगैर व्यर्थ है |
•ब्रेसों पहले पेंटर थे, फिर फोटोग्राफर बने | कई छोटी छोटी फिल्में बनाई |
उनकी फिल्मों मे दूसरे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बदलती दुनिया और
एकात्म होती प्रवत्ति का असर दिखता था |
•उन्होने 60 साल
तक की उम्र मे मात्र 13 फिल्में ही बनाई लेकिन वे सारी
फिल्मे अपने ट्रीटमेंट के हिसाब से बेजोड़ थी |
•डायरी ऑफ अ कंट्री, पिकपाकेट,अ हजार्ड बाथजार, द
ट्रायल ऑफ जॉन ऑफ आर्क ऐसी ही फिल्मों मे शुमार थी |
14. इंगमार बर्गमैन
(स्वीडन)
•इन्हे फिल्में बनाए के लिए कभी ज्यादा पैसो की जरूरत
नहीं पड़ी | उन्होने सिनेमा जगत को सिखाया कि किस तरह फिल्मों
को सुनियोजित तरीके से एक टीम के जरिये फिल्म का उत्पादन किया जा सकता है |
•उनकी खुद की फिल्मों के विषय अवसाद
और निराशा से जुड़े होते थे | इन्हे नए तरह के शॉट फिल्मों मे
प्रयोग करने के लिए जाना जाता है |
•वे एक ऐसे निर्देशक है जिन्होने
फिल्म के साथ साथ थियेटर मे भी काम किया | उन्होने जहां 60
फिल्मों का निर्देशन किया वही 170 से ज्यादा
नाटकों का भी निर्देशन किया है |
•वर्गमैन कि आखिरी फिल्म ‘फैनी एंड अलेक्ज़ेंडर 1982’ थी | यह फिल्म 5 घंटे की थी |
•इसके अलावा इनहोने द सेवेन्थ सील,वाइल्ड स्ट्राबेरीज़, व्विस्पर, क्राइज़ एंड पर्सोना नाम कि फिल्मे बनाई है |
15. फ़्रांकोइस रोनाल्डो
(फ्रेंच)
•वर्ल्ड सिनेमा मे ऐसे कम ही लोग है जो व्यावसायिक तौर
पर भी सफल रहे | जब फ्रांस मे नए सिनेमा कि लहर चली तो मजबूत
तारीके से दर्शको को उन्होने अपनी फिल्मों के जरिये जोड़ा |
• वे 52 साल
ही जिये, पर वो निर्देशक के साथ साथ स्क्रीन राइटर, फिल्म आलोचक के तौर पर भी जाने जाते थे|
•उन्होने 25 फिल्मे
बनाई |
•जब हम कभी सिनेमा मे बदलाव कि बात करते है तो इनकी फिल्म द 400 ब्लोज़ का नाम लेते है | इस फिल्म के साथ विश्व
सिनेमा कि नई चेतना को समझा जा सकता है |
•बचपन मे फीस न भर पाने के कारण
उन्हे स्कूल से निकाल दिया गया था फिर इनहोने 14 साल कि उम्र
मे तय इया कि वो खुद कमा कर पढ़ाई करेंगे?
•ये पढ़ाई क्या थी :- रोज तीन फिल्मे
और हफ्ते मे तीन किताबें पढ़ना |
16. माइकल एंजेलो
अंटोनियोनि
•महान इतालवी निर्देशक अंटोनियोनि कि फिल्मों मे
आधुनिक जीवन शैली से उत्पन्न विरोधाभाषों और नैतिक संकटों का वर्णन मिल जाता है,
•अंटोनियोनि पहले रंगीन सिनेमा से
परहेज करते थे | लेकिन जब रंगीन फिल्मों कि बारी आई तो
उन्होने अपना जौहर दिखाया |
•उनकी सबसे सफल फिल्म चाइम्स ऑफ मिड
नाइट है | यह फिल्म शेक्सपियर के कई नाटकों पर आधारित होने
के साथ उनकी खुद कि निजी ज़िंदगी पर भी आधारित है |
•अंतोनियोनी की फिल्में अक्सर मानव
मन की गहराइयों को टटोलती थीं, मगर उनकी वैश्विक अपील थी,
जो मनुष्य की त्रासदी की बयान करती थी. करीब दो दशकों तक अंतोनियोनी
ने अपनी फिल्मों के जरिए द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की संवेदना को अभिव्यक्त करने
का काम किया.
17. सर्गेई आइन्स्टाइन
(सोवियत )
•इनका पूरा नाम सर्गेई मिखाइलोविच
आइस्टाइन था | उन्होने न केवल एक से बढ़ाकर एक मूक फिल्में
बल्कि जब बोलती फिल्मों का दौर आया तो फिल्मों कि दुनिया मे एक अलग रेखा खींची|
• अपने 24 साल के कैरियर मे उन्होने सिर्फ 6 पूर्ण फिल्मे बनाई
| स्ट्राइक (1924),बैटलशिप पोटेमकिन (1925),
आक्टोबर (1928), ओल्ड एंड न्यू(1929), अलेक्ज़ेंडर नेवस्की(1938),इवान द टैरिवल (1944)
•बाकी तीन दर्जन फिल्में अधूरी
फिल्मे शब्दबद्ध होकर बाहर आ गयी |
•इनका पूरा नाम सर्गेई
मिखाइलोविच आइस्टाइन था | उन्होने न केवल एक से बढ़ाकर एक मूक
फिल्में बल्कि जब बोलती फिल्मों का दौर आया तो फिल्मों कि दुनिया मे एक अलग रेखा
खींची|
• अपने 24 साल के कैरियर मे उन्होने सिर्फ 6 पूर्ण फिल्मे बनाई
| स्ट्राइक (1924),बैटलशिप पोटेमकिन (1925),
आक्टोबर (1928), ओल्ड एंड न्यू(1929), अलेक्ज़ेंडर नेवस्की(1938),इवान द टैरिवल (1944)
•बाकी तीन दर्जन फिल्में अधूरी
फिल्मे शब्दबद्ध होकर बाहर आ गयी |
•इनका पूरा नाम सर्गेई मिखाइलोविच आइस्टाइन
था | उन्होने न केवल एक से बढ़ाकर एक मूक फिल्में बल्कि जब
बोलती फिल्मों का दौर आया तो फिल्मों कि दुनिया मे एक अलग रेखा खींची|
• अपने 24 साल के कैरियर मे उन्होने सिर्फ 6 पूर्ण फिल्मे बनाई
| स्ट्राइक (1924),बैटलशिप पोटेमकिन (1925),
आक्टोबर (1928), ओल्ड एंड न्यू(1929), अलेक्ज़ेंडर नेवस्की(1938),इवान द टैरिवल (1944)
•बाकी तीन दर्जन फिल्में अधूरी
फिल्मे शब्दबद्ध होकर बाहर आ गयी |
ज्यां लुक गोदार (फ्रांसीसी )
•ज्यां लुक गोदर्द के बगैर विश्व
सिनेमा की चर्चा बेकार है | यह सही है की पूरे विश्व के
सिनेमा मे सबसे ज्यादा योगदान फ्रांस के सिनेकारों का ही रहा है |
•गोदार पहले पेशेवर आलोचक थे |
फिर उन्होने फिल्म बनाने की तरफ अपना रुक्ख मोड़ा | उनकी फिल्मों मे बहुत तीखे राजनीतिक दृष्टिकोण होते थे | जिसके साथ दुनिया मे व्यापक चेतना वाली अलग तरह की राजनीतिक फिल्मों की
शुरुआत हुई | उनका यकीन न तो घोर व्यावसायिक फिल्म मे था न
ही घोर समानान्तर फिल्म की तरफ |
•पश्चिम के कई समीक्षक गोदार को
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का सबसे प्रभावशाली फिल्मकार मानते हैं। इस 80 वर्षीय जीनियस फिल्मकार की पहली ही फिल्म ‘ब्रेथलैस’
(1959) ने दुनिया में सिनेमा की भाषा और शिल्प को बदल कर रख दिया
था।
जीगा वर्तोव
•इनका सही नाम डेविड अबेलेविच
कोफमैन था | वे सोवियत वृत्तचित्र कार,न्यूज़रील
निर्देशक और फिल्म के सिध्दांतकार भी थे |
•इनकी फिल्म मैन विद ए मूवी कैमरा
विश्व की श्रेष्ठ फिल्मों मे गिनी जाती है |
•इनकी मूक दौर की प्रसिद्ध फिल्म
विश्व का छठा भाग थी | इसे सिने कविता भी कहा गया |
•ध्वनि आने के बाद वर्तोव ने एक और
फिल्म 1930 मे बनाई | फिल्म का हिन्दी
नाम उल्लास था | (enthusiasm) | 1934 मे लेनिन के तीन गीत
नाम की एक फिल्म और बनाई |
18 जफर पनाही (ईरान)
•
फिल्मों की दुनिया जितनी सतरंगी है कहीं-कहीं उतनी डार्क भी…कई काले अध्याय इस क्रियेटिव
माध्यम से चिपके हुए भी मिलते हैं..11 जुलाई1960 मे जन्मे ज़फ़र पनाही की फिल्मों पर
बीस साल का प्रतिबंध विश्व सिनेमा का एक डार्क साइड ही है.. सोच कर देखिए..इस
ख्याल से आप सहम जायेंगे कि एक फिल्मकार को सिर्फ इसलिए छः साल की कैद दी गयी
क्योंकि वो अपने देश के क़ानून की हकीकत तराश रहा था..
•
जी हां..ज़फ़र पनाही ईरान के फेमस फिल्मकारहैं..उन्हें दिसंबर 2010 में
छः साल की जेल दी गई…उन पर ,सरकार के मूल्यों के ख़िलाफ़ काम करने का आरोप है..बीस साल तक फिल्म निर्माण
की हर विधा पर बैन के साथ उन्हे विदेश जाने तक की इजाज़त नहीं है…ये क्रियेटिविटी पर पहरे के जैसा है…वर्ल्ड सिनेमा
को नायाब फिल्मों से सजाने वाले पनाही की सिनेमाई अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध है.. वजह
2006 में आयी उनकी फिल्म ऑॅफ़ साइड रही..
•
फिल्म की कहानी लड़कियों के एक ग्रुप के बारे में थी जो ईरानी क़ानून
के उल्लंघन का दुस्साहस करते हुए पंहुच जाती हैं फुटबॉल मैच देखने..दरअसल ईरानी
क़ानून के मुताबिक महिलाओं को स्टेडियम में फ़ुटबॉल मैच देखने की मनाही है..ये
प्रतिबंध कितना कठोर है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि ऐसे स्टेडियम
में वीमेन टॉयलेट्सतक नही बनाये गये हैं..गौरतलब है कि ऑफ साइडपनाही की अपनी
ज़िन्दगी से बावस्ता है…
19 .बकौल-पनाही-
“फुटबॉल देखने की मेरी बेटी की ख्वाहिश को मैं चाहकर भी कभी पूरा नहीं कर पाया क्योंकि मैं ईरान के उस क़ानून से वाकिफ़ था जिसमें औरतों को ऐसे मैच देखने की इजाज़त नहीं..इसी टीस ने ऑफ साइडमुझे बनाने की प्रेरणा दी”
हंसते हंसाते… फुटबॉल के मैच के रोमांच को न देख पाने की विवशता के बीच स्त्रियों की स्वतंत्रता से जुड़े कई सवालों को सहजता से दिखाती ये फिल्म भले ही ईरान में बैन कर दी गई मगर दुनिया भर में ये सिर्फ बेहद कामयाब रही बल्कि बर्लिन फिल्म फेस्टिवल के प्रतिष्ठित अवार्ड सिल्वर बीयर से सम्मानित भी की गई..
पनाही ने ऑफ साइड के पहले एक लाजवाब फिल्म द सर्किल बनायी..साल 2000 मे आयी ये फिल्म भी ईरान में बैन थी.. फिल्म की शुरूआत एक हॉस्पिटल के मैटर्निटी वार्ड की सुबह से होती है और अंत जेल की काल कोठरी में बीत रही एक शाम पर..फिल्म एक ऐसी महिला के इर्द-गिर्द घूमती है जिसने हाल ही में एक बेटी को जन्म दिया है जबकी अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट में बेटा होने की बात रहती है…ये नारी पीड़ा का बेहद दमदार प्रस्तुतिकरण था जिसने सभी को झकझोर दिया,,
•
मेरे ख्याल से पनाही से बेहतर स्त्रियों को कोई नहीं समझ सकता.
•
वो अपनी फिल्म The White Baloon में एक छोटी बच्ची की मासूम सी परेशानी पर कहानी
कह जाते हैं..फिल्म की यही सात साल की बच्ची हीरोइन है..जिसकी ज़िन्दगी में विलेन
परिस्थितियां हैं..ईरानी और खास तौर से पनाही की फिल्मों में कोई विलेन नहीं
होता..उलझनों और दिक्कतों को रास्ते के कांटे के तौर पर दिखाया जाता है..ये फिल्में
हमेशा बुराई पर अच्छाई की जीत की प्रतीकात्मक पेशकश सरीखी होती हैं..और दि व्हाइट
बलून में रजिया नाम की इस नन्ही सी जान की दुश्मन भी परिस्थितियां हैं.
•
.कहानी में ईरानी नये साल का बैक्ड्रॉप है जिसके लिए रजिया को
गोल्डफिश चाहिए..मां गरीब है मगर बेटी की इस ख्वाहिश को पूरा करते हुए हिदायत देती
है कि इसे गुमाना मत..बस यहीं से रजिया और इस पैसे के बीच आंख मिचौली का खेल शु
डिग्री हो जाता है.
•
.रजिया पहली बार पैसे गंवाती है और फिर उसे हासिल भी कर लेती है मगर
दूसरी बार ये पैसे उसके सामने पड़े होते हुए भी उसकी पहुंच से दूर होते हैं..इन
रूपयों को पाने में वो कईयों से मदद मांगती है और पूरी फिल्म उसकी इसी जद्दोजहद पर
तराशी गई भावनात्मक पेंटिग है।सच में धरती पर मनुष्य की आधी आबादी यानि कि
स्त्रियों के हक़ की बात करता पनाही का सिनेमा विश्व भर के फिल्मकारों को नई राह
दिखाता है..लेकिन सवाल जिसका जवाब नहीं है कि पनाही अब कभी फिल्में बना पायेंगे या
नहीं..क्या विश्व सिनेमा समुदाय ईरानी हुकुमत के खिलाफ बेबस है? अगर हां तो मुझे लगता है कि विश्व
सिनेमा भी एक तरह के प्रतिबंध में जी रहा है।
•
20 अकीरा कुरासोवा (जापान)
•
1936 मे इन्होने जापानी फिल्म इंडस्त्री मे कदम रखा | पहले वो पेंटर थे, शुरुआत मे कई फिल्मों की स्क्रिप्ट राइटिंग और सह निर्देशन किया |
•
1943 मे दूसरे विश्व युद्ध
के दौरान उन्होने पहली बार निर्देशक के रूप बेहद लोकप्रिय फिल्म साशिरो सुगता बनाई
| फिर
युद्ध के बाद सराही गई फिल्म ड्रंकन एंजल | उनकी पत्नी खुद
फिल्मों मे अभिनेत्री हुआ करती थी | 80 के दशक मे उन्होने
कागेमुशा और रान फिल्म बनाई | उन्हे सौ सालो मे एशिया की
बहतारी के लिए काम करने वाला कहा गया |
•
अकीरा कुरोसावा की
श्वेत-श्याम फ़िल्म 'राशोमोन'
एक ही घटना का तीन अलग - अलग तरीकों से जीवंत प्रस्तुतीकरण है।
21 स्वाधीनता आंदोलन और हिन्दी
सिनेमा-
•
आज़ादी, इस एक
शब्द मे न जाने कितनी कुर्बानियाँ, कितनी कल्पनाएं, कितने कष्ट,कितने कंदन और कितने प्रयास छिपे है इसका
कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता | स्वतन्त्रता के लिए आंदोलन
हुए,लड़ाइयाँ लड़ी गयी,पीड़ाए मिली,असंख्य शहादतें हुई तब जाकर कहीं आज़ादी मिली |
•
15 अगस्त 1947 को भारत भूमि पर आज़ादी की सुनहरी किरने पड़ी, देशवासी फूलों की तरह खिल उठे |
सदियों की गुलामी से मुक्त
होकर देशवासियों ने खुली हवा मे सांस ली | नए भारत के
निर्माण मे राष्ट्र नेता जुट गए |
•
आज़ाद भारत के भविष्य
निर्माता, देश को
उन्नतशील बनाने की सोच के साथ कई योजनाओं का निर्माण और इसका कार्यान्वयन करने मे
लग गए |
•
1951 मे भारत के विकास के लगभग दो हज़ार उनसठ करोड़ रुपये की पंचवर्षीय
योजना की घोषणा की गयी |
•
1949 मे आज़ाद भारत की सरकार ने एस के पाटिल की अध्यक्षता मे जो फिल्म
इन्क्वायरी कमेटी गठित की थी उसने सन 1951 मे अपनी रिपोर्ट पेश करते हुए फिल्म जगत
को स्टूडियों पद्धति से मुक्त करते हुए व्यतिगत क्षमता वाले निर्माताओं को फिल्म
निर्माण मे आने का सुझाव दिया और फिल्म निर्माण मे व्यव हो रहे काले धनो से मुक्ति
पर बल दिया |
•
1952 मे आज़ाद भारत प्रथम बार आम चुनाव हुआ और पंडित जवाहर लाल नेहरू
देश के पहले प्रधान मंत्री बने |
•
इसी वर्ष भारतीय फिल्म समारोह की शुरूआत हुई जो फिल्म्स डिवीजन
द्वारा मुंबई,चेन्नई,कोलकाता,मद्रास,और कोलकाता मे
आयोजित किया गया |
•
इसी साल द इंडियन सिनेमेटोग्राफ एक्ट 1952 को सर्वसम्मति से पास किया
गया जो 1918 मे तत्कालीन ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाए गए एक्ट से कई प्रकार से भिन्न
था |
•
1952 मे संगेट नाटक एकेडमी की स्थापना हुई तथा 1954 मे नेशनल गैलरी
ऑफ मार्डन आर्ट नयी दिल्ली मे स्थापित किया गया |
•
1955 मे अमेरिका के न्यूयार्क शहर के म्यूजियम ऑफ मार्डन आर्ट मे
भारतीय फ़िल्मकार सत्यजीत रे की प्रथम बांग्ला फिल्म पांथर पांचाली का वर्ल्ड
प्रीमियम हुआ | इसी साल
भारत ने बाल फिल्मों को प्रोत्साहन के लिए द चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी की स्थापना
की गयी |
•
स्वतन्त्रता के पाँच वर्ष बाद,1952 मे अड़तालीस सौ करोड़ की राशि से द्वितीय पंचवर्षे
योजना शुरू की गयी | 1958 मे कॉपी राइट एक्ट तथा 1959 मे
दूरदर्शन की स्थापना हुई |
•
लाल बहादुर शास्त्री देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने |1951 मे एस के पाटिल की अध्यक्षता
मे फिल्म इंक्वायरी कमेटी की रिपोर्ट मे
दर्ज सुझावों पर अमल करते हुए तेरह चौदह वर्ष बाद भारतीय राष्ट्रीय फिल्म
अभिलेखागार (फिल्म आर्काइव) की स्थापना पुणे मे की गयी |
•
कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान देश के बटवारे के समय से ही लड़ रहा था | और फिर उसे इसी को मुद्दा बनाकर
1965 मे भारत मे आक्रमण कर दिया | भारतीयों ने डट कर मुक़ाबला
किया और पाकिस्तान को हराया |
•
आज़ादी के बाद भारत ने एक नहीं पाँच पाँच युद्ध झेले | जिसमे से चार पाकिस्तान और एक बार
चीन से |
•
1966 मे दादा साहब फाल्के के नाम पर फिल्म मे योगदान के लिए हर वर्ष
पुरस्कार की शुरुआत हुई |
•
1956 से 66 के समय मे सामाजिक फिल्मों का चलन चरम पर था | इन फिल्मों मे अपने समय से जुड़ी
तमाम सामाजिक समस्याओं को उठाया गया था |
•
इनमे बी आर चोपड़ा की एक ही रास्ता 1956,नया दौर 1957, साधना1958,घूल का फूल1959,
•
आर के फिल्म्स की जागते रहो 1956,जिस देश मे गंगा बहती है 1960,गुरुदत्त
की प्यासा 1957, कजाग के फूल 1959,
•
महबूब प्रोडकसन की मदर इंडिया 1957
•
शक्ति पिक्चर्स की इंसान जाग उठा 1959,
•
कृष्ण चोपड़ा की हीरा मोती
1959,
•
महल पिक्चर्स की दिल अपना प्रेत पराई 1960 आदि प्रमुख थी |
•
गौर से देखे तो पता चलता है
की इन फिल्मों के माध्यम से समाज के धुखते रंग को पहचानना सुधारवादी दृष्टिकोण के
तहत समाज को एक दिशा देने की कोशिश की गयी |
•
पचास के दशक के बाद आइये अब बात करते है साठ के दशक मे बनी फिल्मों
की |
•
इस दौरान देश की राजनीतिक और सामाजिक बदलाव के बीच फिल्मों मे आई परिवर्तन की धारा को देख
और परख सकते है |
•
1961 मे नितिन बॉस की फिल्म गंगा जमुना पूर्वी भारत के किसी गाँव की
कहानी है | जहां दो
भाइयों मे बड़ा भाई गाँव के जमीदार के जुल्म के कारण गाँव से सटे पहाड़ियों पर जाकर
शरण लेता है और जमीदार से बदला लेने के लिए डाकू बन जाता है | और दूसरा भाई पढ़ लिख कर इंस्पेक्टर बन गाँव मे आता है |
•
स्वतंत्रता मिलने के बाद भारत मे चहुमुखी विकास के दरवाजे खुल गए थे | यह धारणा भी बन गयी थी कि देश
मे काम करने वाले ही खाएँगे ,और वे ही कमाएंगे | 1965 आते आते देश से जमीदारी और
नवबीयत का रुआब कम होने लगा था |
•
मुंशी प्रेमचन्द्र द्वारा सन
1930 मे लिखित उपन्यास गबन पर 1966 मे
कृष्ण और इनके मरने के बाद ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन मे फिल्म गबन बनी | फिल्म, 1928 मे इलाहाबाद मे अङ्ग्रेज़ी शासकों के
विरुद्ध भड़की भारतियों कि भावनाओं और सन 1929 मे महात्मा गांधी और लार्ड इरविन के
बीच हुए समझौतों कि पृष्ठभूमि पर आधारित है |
•
1965 मे नवकेटन के बैनर तले बनी फिल्म प्रेम पुजारी आई | फिल्म 1965 मे भारत पाक लड़ाई कि
पृष्ठभूमि मे युद्ध और शांति की बातें करने वाली थी | यह
फिल्म देवानन्द ने बनाई थी |
•
1967 मे निर्माता निर्देशक मनोज कुमार की फिल्म उपकार आई | राष्ट्रीय भावना पर आधारित फिल्म
उपकार कि कहानी भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री द्वारा राष्ट्र
को दिया गया नारा जय जवान जय किसान से प्रभावित थी |
•
हर महत्वपूर्ण घटना और अवसर को पर्दे पर उतार दुनिया तक पहुंचाने
वाले इस बॉलिवुड में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी यूं तो कई फिल्मों का निर्माण
किया गया है लेकिन उनमें से कुछ फिल्में इतनी मार्मिक हैं कि देखने वालों की आंखों
में आंसू ले आएं. इतना ही नहीं आजादी के बाद भारतीयों में देश प्रेम का जज्बा कहीं
कम ना हो जाए इसीलिए स्वतंत्रता संग्राम के अलावा देश प्रेम पर आधारित फिल्में भी
समय-समय पर निर्मित की जाती रही हैं...............
•
मदर इंडिया – महबूब खान निर्देशित यह फिल्म बॉलिवुड की सबसे अधिक सफल फिल्मों में से एक
है. वर्ष 1957 में प्रदर्शित फिल्म मदर इंडिया की पृष्ठभूमि अभी-अभी आजाद हुए देश
और उसके दयनीय हालातों पर केंद्रित है. इस फिल्म की कहानी एक ऐसी महिला के
इर्द-गिर्द घूमती है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने दोनों बच्चों का
पालन-पोषण करती है. नए-नए आजाद हुए भारत में व्यक्ति को किस गरीबी और भुखमरी का
सामना करना पड़ा यह इस फिल्म में साफ प्रदर्शित किया गया था.
•
पूरब और पश्चिम – देश भक्ति पर आधारित यह अब तक की सबसे कामयाब
फिल्मों में से एक है. मनोज कुमार, जिन्हें एक समय बाद ‘भारत कुमार’ के नाम से भी जाना जाने लगा था, और सायरा बानो अभिनीत इस फिल्म में विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के
लोगों और भारतीय लोगों की सोच और जीवनशैली को दर्शाया गया था. वर्ष 1970 में
प्रदर्शित यह फिल्म मनोज कुमार की देश भक्ति पर आधारित तीसरी फिल्म थी.
•
शहीद – वर्ष 1964 में रिलीज यह फिल्म भी
मनोज कुमार अभिनीत थी. इस फिल्म का गीत सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
जो मौलिक तौर पर प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी राम प्रसाद बिस्मिल की
रचना है, एक बड़ी हिट साबित हुई थी. आज भी इस फिल्म की
लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है.
•
क्रांति – 1981 में प्रदर्शित फिल्म क्रांति की पृष्ठभूमि भी
स्वतंत्रता आंदोलन पर ही आधारित थी. मनोज कुमार, शशि कपूर, हेमा मालिनी और दिलीप कुमार द्वारा अभिनीत इस
फिल्म में 1925 से 1875 तक के काल को दर्शाया गया है. इस फिल्म की कहानी जावेद
अख्तर द्वारा लिखी गई थी और इसका निर्माण-निर्देशन मनोज कुमार ने किया था.
•
बॉर्डर – वर्ष 1997 में आधारित इस फिल्म में भारत-पाक जंग पर आधारित इस फिल्म
के द्वारा आजादी के बाद जंग के मैदान और सैनिकों के परिवारों की दास्तां बयां की
गई है. मानवीय संवेदनाओं पर आधारित यह फिल्म आज भी देखने वाले लोगों की आंखों में
आंसू ले आती है.
•
. रंग दे बसंती – राकेश ओमप्रकाश मेहरा द्वारा निर्देशित यह फिल्म युवाओं के अंदर
देशप्रेम के भाव को जगाने के उद्देश्य से बनाई गई थी. कॉलेज में पढ़ने वाले मनमौजी
युवाओं का जब असल जीवन से सामना होता है तो उन्हें किन-किन हालातों से गुजरना
पड़ता है यह फिल्म इसी पर आधारित थी.
22
हिन्दी सिनेमा मे विभाजन की
त्रासदी
देश का विभाजन किसी विध्वंश से कम नहीं है | अपने ही
देश के नेताओं कि जल्दबाज़ी और भूलों के परिणाम के रूप मे विभाजन सामने आया |
इस विभाजन का कारक ब्रिटेन था मगर कारण कांग्रेस और मुस्लिम
लीग के नेता थे |
स्थानान्तरण और पुनर्वास के बीच लाखों जिंदगियाँ
इतिहास कि इस भूल से रौंदी जाएगी और लाखों
दिलों से निकली आह आधी सदी के बाद भी समाज को टीसती रहेगी, देश दर्द
तो महसूस करता रहेगा मगर कभी उस घाव का इलाज नहीं करेगा जो धीरे धीरे आतंकवाद का
रूप ले लेगा |
विभाजन की त्रासदी पर ढेर सारा साहित्य लिखा गया
किन्तु फ़िल्मकारों ने विभाजन के प्रति वाइस चिंता और छटपटहट नहीं दिखाई |
दीपा मेहता की अर्थ 1947
और डॉ चन्द्र प्रकाश द्विवेदी कि पिंजर विभाजन कि त्रासदी पर ही बनी है | 1949 मे
फिल्म लाहौर , 1961 धर्मपुत्र, 1973
गरम हवा, तमस जैसी
फिल्मे विभाजन कि त्रासदी पर बनी बताई तो जाती है पर साहित्यकारों द्वारा लिखे गए
साहित्य जैसी प्रतीत नाही होती |
पाकिस्तानी मेल, गदर, शहीद-ए-मुहब्बत बूटासिंह जैसी फिल्मे विभाजन कि सच्ची कहानी कहती कम
बल्कि विभाजन मे बिछड़े प्रेमियों कि ज्यादा लगती है | फिल्म समीक्षक अजय ब्रम्हत्ज्म अभी तक कि
फिल्मों मे पिंजर को विभाजन कि त्रासदी पर बनी फिल्मों का एक अच्छा प्रयास
मानते है
चूँकि देश का बँटवारा
धर्म के आधार पर हुआ था इसलिए बँटवारे के बाद जो नफरत फैली वह धार्मिक ही थी। शायद
हमारे फिल्मकार बँटवारे के कटु यथार्थ को विषय बनाने में डरते होंगे ताकि कोई
समुदाय नाखुश न हो जाए। अतीत के गहरे जख्म को हरा करने की साहस न कर पाते होंगे।
इस विषय पर लंबे समय तक हमारे फिल्म जगत में शून्यता रही। 1973 में एम0एस0 सथ्यू
ने ‘गर्म हवा’
बनाकर इस खालीपन में मजबूती के साथ दस्तक दिया। ‘गर्म हवा’ में विभाजन के बाद ऊपजे संकट से विभिन्न
सवालों को उठाया गया। आखिर कोई मुसलमान अपना वतन छोड़कर पाकिस्तान क्यों जाए। केवल
स्थान की बात नहीं है बल्कि रोजगार, व्यवसाय, घर, माटी, समाज सबको एक साथ
इसलिए छोड़ दे कि वह मुसलमान है?
23 स्वाधीनता आंदोलन और हिन्दी
गीत
• इसके बाद फिल्म नास्तिक
मे देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान कितना बदल गया संसार गाना था |
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