रंगमंच
: नाटक की सफलता और नाट्य-सिद्दी:
वस्तुतः
नाट्य का उद्देश्य तभी सिद्ध होता है जब दर्शकों की आनन्द की प्राप्ति होती है .
यह काम तबतक सम्भव नहीं होता जबतक नाटक को रंगमच पर प्रस्तुत न किया जाय . पाठ्य
नाटक एक विडम्बना है, इस पर पहले ही विचार हो चूका है . यहाँ इसके उल्लेख का इतना
हे अभिप्राय है की जो नाटक रंगमंच पर प्रस्तुत ही नहीं होते उन्हें नाटक माना ही
नहीं जा सकता . नाटक कोई रंगमंच-निरपेश वस्तु नहीं है वह तो उसीका एक मंच है .
इसलिए उसके बिना उसकी कोई गति नहीं सिद्वि का तो प्रश्न ही नहीं उठता .
कोई नाटक अपने उद्देश्य में सफल है अथवा
नहीं इसका पता कैसे लग सकता है ? उत्तर स्पष्ट है कि जिसके लिए उसकी रचना होती है
यदि वह उसे सफल घोषित करे तो ठीक है अथवा असफल ही समझना चाहिए. सचमुच नाटक की
सफलता का निर्णायक प्रमुख दर्शक ही होता है.
दर्शक
की विशेषताएं ;-
प्रस्तुत
सन्दर्भ में दर्शक के स्वरूप पर विचार करना भी समीचीन प्रतीत होता है. आचार्य भरत
ने यधपि नाटक का द्वार सभी लोगों के लिए खोल दिया है, फिर भी इतना तो विचार करना
ही होगा कि दर्शक में कुछ वैसे गुण तो होने ही चाहिए, जो उन्हें नाटक से आनन्द
प्राप्त करने में सहायता कर सकें.
दर्शक की पहली विशेषता यह होनी चाहिए की
वह सहृदय हो. यदि उसने सहृदयता का अभाव है तो फिर निर्जीव वस्तुओं में और उसमें
अन्तर ही क्या होगा ? हम जानते है कि साधरणी करण दर्शक के भाव का होता है. नाटक तो
उसके परिपाक के लिए अवसर प्रदान करता है. परन्तु, जो भाव वहीन नाटक होगा उसपर
अच्छे से अच्छे नाटक का भी क्या प्रभाव् पड़ेगा ?
कलाप्रिय होना दर्शक का दूसरा गुण है.
नाटक एक मिश्रित कला है. और इसलिए उसे ठीक-ठीक समझने के लिए अधिक नहीं, तो कम-सेकम
सामान्य रूम में ही विभिन्न कलाओं की जानकारी दर्शकों को होनी चाहिए. शास्त्रीयता
से दर्शकों का परिचय हो ही, यह आवश्यक नहीं. पर कलाओं में उसकी अभिरूचि हो, यह तो
अपेक्षित है ही. रुचि के अभाव में उसका ध्यान कला-प्रदर्शन की ओर आकृष्ट ही नहीं
होगा. ऐसी स्थिति में वह उसकी क्या सराहना करेगा, क्या भर्त्सना करेगा ? नाटक में
गीत, संगीत,वाध, नृत्य आदि का प्रयोग आवश्यकतानुसार होता ही है. इसलिए, यदि दर्शक
वाधयन्त्रो से भी परिचित रहे तो उसे अधिक आनन्द प्राप्त होगा और साथ ही
सफलता-असफलता का सही निर्णय कर पायेगा.
भरत मुनि अतिरिक्त संस्कृत के प्राय: सभी
प्रमुख नाटककारों ने अपने-अपने नाटकों की प्रस्तावना में दर्शक के स्वरूप पर
प्रकाश डाला है. ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम’ में कालिदास ने कहा है की दर्शक का
रसभावनिपुण होना अनिवार्य है. इसी प्रकार, ‘मालविकाग्नि मित्र’ और ‘मालती-माधव’
में भी विद्वत-परिषद् को ही नाटक देखने का अधिकारी माना गया है. रत्नावली और नागानंद
में हर्ष ने दर्शक के रूप में मुख्यतः राजाओं का ही उल्लेख किया है. मुद्राराक्षस
में तो इस बात पर बहुत बल दिया गया है कि नाटक के लिए योग्य दर्शक चाहिए. भवभूति,
जयदेव, सुभट जैसे नाटककारों के भी सीमित दर्शकों का ही संकेत किया है और उसका
प्रधान कारण गुण-सम्पन्नता ही है.
नाट्य-सिद्दी:
भारत मुनि के नाटक की सफलता की शर्तों के
सन्दर्भ में बारह प्रकार की सिद्दीयों का उल्लेख किया है:-
दशांगा
मानुशीसिद्दीदेंविको द्विविधाश्र्या.
नानासत्वाश्रयकुता
शारीरी वाड मयी तथा..
अर्थात
नाटक की सिद्दीयों में दस मानुषी है और दो दैवी. मानुषी सिद्दियों को दो वर्गों
में विभक्त किया गया है---
1. वाकमयी
(वगडमयी)
2. शारीरिक
वाकमयी
सिद्दीयों की संख्या आठ है-
1. स्मिति
2. अर्थहास
3. साकार
4. अतिहास
5. अहोकार
6. रूष्ट्कार
7. प्रथ्रिद्ववाद
8. अवक्रिष्ट.
तात्वर्य
यह की जब अभिनय देखकर दर्शक प्रसन्नता अन्य ध्वनि उत्पन्न करें अथवा मूँह से ‘बहुत
अच्छा’ ‘अति सुन्दर’ या इसी प्रकार का कोई अन्य उदगार व्यक्त करें, तो उसे वगडमयी
सिद्दी कहते है.
शरीरिक सिद्दीयों से अभिप्राय है कि दर्शक
अभिनय से प्रभावित होकर उछल पड़े अथवा हाथ से संकेत करें या कोई ऐसी शारीरिक क्रिया
करें, जिससे यह प्रकट हो की वह नाटक के मूल भाव से तादात्मय स्थापित कर चूका है. कई
बार ऐसा देखा गया है कि खलनायक की भूमिका करने वाले पर दर्शक की ओर से जूते फेंके
गये है. इसी प्रकार, अत्यन्त संघर्षपूर्ण स्थिति में नायक को विषय की ओर बढ़ते हुए
देखकर भावावेश में दर्शकों की ओर से तालियाँ पीटी जाती है. ये सभी लक्षण सफल नाटक
के है.
दैवी सिद्दीयों में एक तो यह देख जाता है
कि अभिनेता अनुकार्य के सर्वथा अनुरूप अभिनय करने में कुशल है अथवा नहीं. यदि
दर्शक को ऐसा प्रतीत हो कि अभिनेता अनुकर्ता न रहकर अनुकार्य ही बन गया है, तो
अभिनय पूर्ण सफल माना जाता है. पर, कभी-कभी ऐसा होता है कि आहार्य अभिनय को लेकर
या किसी अन्य अभिनय में त्रुटी रह हाने के कारण बड़ा ही हास्यास्पद रूप रंगमंच पर
प्रकट हो जाता है, जैसे—कृत्रिम मूंछ या बाल का गिर जाना अथवा भूमिका के विपरीत
कोई कार्य कर देना आदि.
दूसरे प्रकार की दैवी सिद्दियों में समय
और परिस्थिति की अनुकूलता और प्रतिकूलता का प्रश्न प्रमुख है. अग्निकाण्ड हो जाना,
शत्रु द्वारा आक्रमण करना, भूकंप हो जाना, भीषण वर्षा और वजूपात का हो जाना आदि
ऐसी घटनाएँ है, जिन पर अबतक मनुष्य का वश नहीं चलता है. इसलिए, इन्हें दैवी कारणों
के अंतर्गत रखा गया है. नाटक के जो नान्दी, प्ररोचना या अन्य प्रकार की
रंग-भूषा
का विधान किया गया है, उसके मूल में यह भावना भी काम करती रही है.
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