Saturday, 9 April 2016

नाटय प्रदर्शन अधिनियम 1876 क्या है ? इस का निर्माण क्यों किया गया ?

नाटय प्रदर्शन अधिनियम 1876  क्या  है ? इस का निर्माण क्यों किया गया  ?

    1876 में ब्रिटिश राज ने भारतीय रंगमंच पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित करने के लिए नाटय प्रदर्शन अधिनियम पारित किया । भारत देश ब्रिटिश समाज का उपनिवेश था अत: ब्रिटिश राज की जातीय विरोध में रंगमंच को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा ।  क्रांती एवं विरोध की इस नई धारा को रोकने और इस पर नियंत्रण स्थापित करने की दृष्टी से ब्रिटिश सरकार ने इस अधिनियम की स्थापना की अत: इस अधिनियम को वक्त पूर्वक स्थापित किया । तत्कालीन वायसराय की नर्थ बूककि राय में इस अधिनियम के द्वारा भारत में रंगमंच पृदृश्य को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है  इस अधिनियम के संबंध में उनके निम्न विचार जो इस प्रकार है :-      

1.                            इस अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के द्वारा किसी भी नाटक सार्वजनिक प्रावधान को रोका जा सकता ।

2.                            नाटक के क्षेत्र में मूका अभिनय एवं अन्य नाटय रूपों को भी शामिल कर लिया गया था। अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार ये अधिकार प्राप्त हो गये थे कि वह किसी भी नाटय प्रदर्शन का :-

(क)  सड़यन्त्रकारी प्रकृती का ।
(ख) सामाजिक मूल्यों को ध्वस्त करने का ।
(ग)  कानून द्वारा स्थापित सरकारी नियमों एवं संस्थाओ के विरूद्ध असंतुष्टी एवं विरोध उत्पन्न करने वाला।
  
      व्यक्तियों को भ्रम उत्पन्न करने वाला घोषित किया   जा सकता था तथा एसे प्रदर्शन को निषिद्ध किया जा      सकता था ।

3.                            इस अधिनियम के अन्य प्रावधानों के अनुसार उपनियमों के अवहेलना करने वाले व्यक्तियों के समूह को दंडित करने का प्रावधान भी किया गया है जिसके अंदर तीन साल की कैद और जुर्माना हो सकता था या दोनों ।  

4.                            इस अधिनियम के अंतर्गत सरकारी एजेंसी या अधिकारी को
यह अधिकार प्राप्त था कि वह किसी भी नाटक या नाटकों की संतुष्टी एवं सत्यापन कर सकता था ।

5.                            पुलिस को यह भी अधिकार था कि वह नाटक कि प्रस्तुती के दौरान उस प्रेक्षागृह में जा कर वह उस नाटक को रुकवा भी सकती थी  साथ ही दृश्य सज्जा, वस्त्र एवं अन्य सामग्री को जब्त भी कर सकती थी ।

6.                            सरकार की अनुमती के बिना किसी भी सार्वजनिक स्थल पर नाटक प्रस्तुत करने की अनुमती नहीं थी ।

    इस क्रम में 1947 में भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात भी इस अधिनियम को वापस नहीं लिया गया अपितु विभिन्न प्रांतो की सरकारों ने अपनी-अपनी नीतियों एवं आवश्क्ताओं के आधार पर उपधिनियम में संशोधन कर लागू कर दिया जिनके कारण अधिकांश प्रान्तों में रंगनमंच की गतिविधियों का प्रशासन  का और अधिक नियंत्रण स्थापित हो गया ।


संदर्भसूची –


 कक्षा व्याख्यान – डा. अश्विनी सिंह जी और श्रीमती सुरभि                बिप्लव जी  

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