Thursday, 14 April 2016

नाट्यकला एवं फिल्म अध्ययन विभाग सभी छत्रों हेतु । कार्येशाला संबन्धित ज्ञान प्राप्ती विषय में-




                        नाट्यकला एवं फिल्म अध्ययन विभाग सभी छत्रों हेतु ।

                        कार्येशाला संबन्धित ज्ञान प्राप्ती विषय में-

ड़ा॰ वि          
घर से समय पर न आने के कारण में इन कि कार्येशाला में अनुपस्थित था ।

श्री के॰ आर॰ उपेन्द्र-

इन्होंने ने मैंगलोर से आकर एडवांस अभिनय को लेकर कार्येशाला लगाई और मेंने इन से बहुत सी अभिनय तकनीकियों के बारे में सीखा और बहुत सी इन्होंने मुझे अर्थात सम्मिलित छात्रों को अभिनय से संबन्धित व्यायाम सीखाये और में इन सभी का प्रयोग अपने अभिनय को सुधारनेमें करूंगा इन्होने ने अभिनय संबन्धित प्रयोग प्रक्रिया भी करायी अर्थात एक छोटे से रामायण के लेख को उठा करइन्होने हमे जो सिखाया उसे प्रयोगात्मक भी कर के दिखाया। इन्होने रसो के बारे में भी बताया
अत: मुझे इन का काम बहुत अच्छा लगाऔर मेँ इन सभी प्रयोगो को अपने निर्देशन,अभिनय आदि  मेँ करूंगा और मै आशा करता हूँ कि ये आगे भी हमे ज्ञान देने आए ।

श्री प्रवीण भोले ( पुणे )-

इनकी कार्येशाला मुख्यते एम॰ ए॰ प्रथम छमाही और बीवोक के छत्रों के लिए थी और मेँ फिर भी शामिल हुआ परंतु हमें निरजा पटवर्धन जी की कार्येशाला शुरू होने के कारण वहाँ से जाना पढ़ा था तो मुझे दुख हुआ। अर्थात जब तक था तो मेंने इन से अभिनय सिद्वांत और शैलियाँ का अध्ययन किया और इसे अध्ययन कर मेरी दोहरायी हो गई और कुछ उलझनथी तो मस्तिश मेँ उसे ले कर सफाई हुई ।
अत;अभिनय सिद्वांत और शैलियाँ में निम्नलिखित के बारे में अध्ययन किया :-

                   ओसाइरस एक राजा था तो वह आचनक शड़यन्त्र द्वारा मार दिया गया और प्रजा ने उसे मरा हुआ समझ दफन कर दिया और खाने का समान भी उसके साथ रख दिया क्योंकि वह की प्रथा थी और वह रोने लगे और ओसाइरस मरा नहीं था वो जख्मी हुआ था पर हकीम ने उसे मरा हुआ घोषित कर दिया था वह खाने का सारा समान खा गए और धीमे धीमे उठने लगे तो तभी से एक जलूस सा निकाल सभी लोग वहाँ के राजा ओसाइरस को वापस लाये महल में खुशी के गीत गाते हुये परंतु कुछ साल बाद ओसाइरस मर गए और फिर उस प्रथा को जारी रखा उन्हे दफनाने के बाद एक बचे को रथ पर बैठा के खुशी के गीत गा कर लाया जाता हे हर साल अर्थात एक जलूस सा निकाला जाता है उसी सैम तारीख को ओसाइरस की याद में । वह जो गाँन होता है उसे Dhithiram कहते  है और उमे अनुवाद करने का पहेला काम किया वो Thespis नाम का व्यक्ती था क्योंकि मंत्र पढ़ते तो वहाँ की जनता को समझ नहीं आता था ।




1.     Dhithiram - समूह में गाते बाजते मंत्र गान
2.     Thespis- गाना narration गाना
3.     Aeschilus – ग्रीक लोग मुकुट लगा के आते थे इस प्रक्रिया को कहतेइसकिल्स ।
4.     Theatron

5.     Mediyate Theatre - एक समय था तो उस समय में जिसस आय और उनकी मृत्यु कर दी गई और उनके सात चेले थे तो उनके समय भी नाटक होते थे पर जिसस की मृत्यु के पश्चात उनके चेलो ने सारे यूरोप में भाई चारे को बढ़वा दिया क्योंकि जिसस भी भाई चारे, अमन, चैनऔर शांती को बढ़वा देते थे और नाटक बंद करवा दिये क्योंकि उसमे sexuality और fight  दिखायी जाती थी। इन सात चेलो ने रविवार को कोई काम न करे कहे कर उस दिन जिसस की  church में कहानियाँ सुनानी शुरू कर दी और रविवार को अवकाश घोषित कर दिया ( इसी दिन से पूरे संसार में रविवार का अवकाश चला आ रहा है ) और लोग इस दोरान कहानियाँ सुन बोर होने लगे तो उन्होने इन कहानियों मंच कर नाटक रूप में प्रस्तुत करना शुरू किया और कलाकारों के लिए नोटंकी वालों को जो सड़क पर नाटक करते थे उनको कुछ पैसे दे बुलाना शुरू कर दिया और वो भी खुश हो जाते थे और  church  में नाटकीए रूप में जिसस की कहानियो को बताते तो इससे लोगो का मनोरंजन भी हो जाता था और फिर उन्होने सभी जगह चलते फिरते इन नाटको करना शुरू करवा दिया तो वह  wheels का चलने वाला मंच बनाया और सभी जगह घूम घूम करना शुरू कर दिया तो इस प्रकार के थियेटर को Mediate theatreकहते थे।

कमेडिया डेल आर्ते – इटली में इस प्रकार का थियेटर होता था और 14वीं से 16वींशताब्दी तक इस प्रकार के थियेटर का समय था ये थियेटर कामेडी पर आधारित था इसमे  artist को बहार से नोटंकी वालो को बुला के लाया जाता था।इस प्रकार के थियेटर में कोई लिखित संवाद नहीं होते थे संवाद  सब मोखिक होते थे।

आर्टिस्ट – आर्टिस्ट वह होता था जिसे मंच पर जरूरत के हिसाब से बुलाया जाता था जैसे दादा के मरनेका दृश्ये बनाना है तो इन्हे अपनी ही भाव भंगिमाओ से दादा के मरने फोटो बनाने के लिए कहते थे और वह इन्हे कुछ पैसा दे देते थे और वह खुश हो जाते थे क्योंकि इन लोगो के पास कुछ काम नहीं होता था वह घूम घूम कर नोटंकी करते थे।

Stock character –ये तीन प्रकार के होते थे जो निम्नलिखित है:-



1.  Old-(i). Pantalone (ये एक बूढ़ा चरित्र होता था, पत्लून शब्द यही से निकला जो हम पेन्ट को लेकर इस्तेमाल करते है ) (ii)Dottore-( ये बच्चे का चरित्र होता था और बच्चे के ही रटे रटाये संवाद मिलते थे ) (iii) Capitano ये एक मिलिटरी का चरित्र होता था।

2.  Young Heroes    3. Servants

Life semi Mask and Hubs mask-  Hubs mask का अर्थ जो आँखों, माथे, नाक को कवर करता था।

जर्मनी में रंग मंच की शुरुआत-
 1469 में Johan Gutlenbera ने अपने यहाँ भी नाटको के मंच की इच्छा जताई और अपनी एक टोली को ग्रीक भेजा जिस पर ग्रीक से ही रोमन ने कापी कर नाटक खेलना शुरू किया था पर रोमन लोगों को उनकी भाषा समझ नहीं आने पर सेक्स और लढ़ायी वाले नाटक दिखाना शुरू किया था और इन्ही पर नाटक लिखना और खेलना शुरू किया था । जर्मनी के लोगो को ग्रीक नाटको की लिपि समझ नहीं आ रही थी तो उन्होने अपनी लिपि से मिलती जुलती लिपि वाले रोमन देश के नाटकों को देख नाटक खेलने और उन्ही को पढ़ नाटक लिखना शुरू कर दिया और वह पत्थर की  stamp बनाते और नाटको की printing करते थे।
Elizabeth Theatre-

यही से शेक्सपीर का थियेटर शुरू हुआ और इस समय का थियेटर ट्रैजिडि, कामेडी, पर आधारित था जिसके मुख्य नाटक थे – हैमलेट, किंग लियर, औथेलो,रोमियो जूलियत आदि। कामेडी के नाटक थे- टेमिंग औफ़ दी शूस,मर्चेन्ट औफ़ दी वेलीस,टावेटा नाइयीटआदि ।

19वी शताब्दी –
1850 से 1875 तक के कार्ये काल में Ougust Camptain आया और उसने Mepolian को खत्त्म कर दिया और समाज को ध्यान में रखते हुये निरीक्षण को शुरू कर दिया यही से  Theory of Darvin और  Industrial Revolution  शुरू हुई।
                शेक्सपीर के थियेटर बाद परी, चुढ़ेल आदि की कहानियाँ आई फिर निरीक्षण को ध्यान में रख कर बंद कर दिया गया ये सब और फिर  realistic  लिखे जाने लगे।

Realistic play writers :-

1.   Henry Ibson इनकेनाटक थे :-
(i)              दा डोलस हाउस
(ii)           येनिमाई ऑफ दी पीपल
(iii)        डा वाइल्ड डक्क
(iv)         पिल्लर ऑफ सोसाइटी
(v)            घोस्ट

2.   Jeorge Show (England )इनके नाटक थे :-

(i) पिग्मलीओन
   (ii) आर्म्स एंड मैन ।

3.     Augstt Steamberg  (Swiden ) इनके नाटक थे :-

(i)              फादर मिस जूलिया

              उस समय सन 1880 जर्मनी के राजा भी नाटक देखने जाते थे जिनका नाम Duke Of Saxe Meiningen था और उन्होंने कहा कैसे बेड़ंगे  से नाटक होते है और इन सबको ध्यान में रखते हुये अच्छे नाटक कर ने के लिए अपनी Meiningen Society of Theatre बनाई और पूरी कास्ट्यूमे के साथ 60 दिन Run throughउनके ग्रूप में चलता था। इन्होंने अपनी अभिनय शैली भी बनाई जिसे फेसिया और गेस्चर कहते है ।

Liberal Theatre Movement – सन 1890 में Liberal Theatre Movement शुरू हुआ Amilzoloकानाटक Andre Antoine द्वारा किया गया। Liberal Theatre Movement इब्बसन के नाटक करते थे। फिर Andre Antoine कोयले की खान में गए उन्होने वहाँ पे 6 महीने तक नोकरी की और फिर मजदूरों की हालत पर लिखा
                        Masco Art Theatre की शुरुआत हुई Konstensis Elexsisvit ने इसकी शुरुआत की जिनका real नाम  Konstensis Stanislavaski जो Russia में Masco के थे वह परिवारिक रूप से बहुत धनी थे और जाइंट फॅमिली में रहेते थे इनके परिवार में काफी लोग थे जो संयुक्त रूप से रहते थे और वह अपने पिता जी से छुप-छुप के थियेटर करते थेतो एक बार उनके पिता जी को पता चल गया और उनसे पूछा तो उनके पिता जी बोले यदि थियेटर ही करना है बढ़े लेवल पर व्यवसायीक तोर पर करो पर वह कुछ नहीं बोले और एक बार इन्हे 65 साल के बूढ़े का चरित्र अदा करना था जो अकेला रहेता था खुसढ़ थाकिसीसे नहीं बात चीत करता था और लोगों के निकट आने पर क्रोधित हो जाता था,सब से घृणा करता थाऔर ये इनके लिए बहुत मुश्किल था क्योंकि ये हमेशा से सभी के बीच में रहते थेऔर प्रसन्न रहते थे और परिवारिक रूप से धनी थेपर इनके गुरु ने कहा की एक बूढ़े का चरित्र ही तो है थोढ़ी सीकमर झुकनी है और सवांद   लड़खढ़ाते हुये बोलने है बस हो गया तो इन्होने ने कहा नहीं तो ये उस रात घर नहीं गए घर के पास रीहेएरसल के बाद सीधे एक पुराने किले में चले गए और वहाँ उन्होने actor और characterदोनों का ध्यान किया वह पूरी रात उसी किले में एक कोने में बेठे रहे और ध्यान करते रहे ।
       
Masco Art Theatre -Masco Art Theatreकी शुरुआत 1897 में हुयी Mularecvich Narelvich Dhanchenko जो Writer, Actor, Directorथे एक बार Konstensis Stanislavaski  से अचानकएक Bar मिले और वह जानते थे की वह थियेटर करते हैउन्होने ने वहाँ बेठ कर बातचीत की और 24 घण्टे तक बेठे रहे दुकान बन्द होने पर भी बेठे रहे और अगले दिन दुकान दार वापिस आया तो वैसे ही उसे वही बातचीत करते हुये मिले तो दोनों ने मिल के  Masco Art Theatre  बनाया।

          Konstensis Stanislavaskiने एक किताब लिखी जो  Russian  भाषा में थी जो की “Actor work on himself for his role “ पर अधारित थी और Elizabethan Roynold Hopgood ने दो भागो में Translate की थी जिसका पहला भाग था Actor Propere   और दूसरा भाग था Building a character
                   Method of Acting पर Konstensis Stanislavaski ने निम्नलिखित चरणों को बताया :-

1॰      Training – Body and Voice 
2.       Stage Technique
3.              Given Circustances
4.              “If”
5.              Emotional Memory
6.              Unit and Objective
7.              Through Line

U,S.A में भी इन सातों का प्रयोग होने लगा और  Konstensis Stanislavaskiके शिष्य थे USA  के प्रसिद्ध  Lee strassberg इन्होंने “The Method “  के नाम से एकटर स्टुडियो खोला और इन्होंने Konstensis Stanislavaski के इन ऊपरी सात में से सिर्फ Training – Body and Voic, Stage Technique,Unit and Objectiveको नकारा।

Vsevolod Mayorhold-ये 1977 में आए और इन्होंने निम्नलिखित पर ज़ोर दिया :-

1.   Theatricality

2.   Constructivisim

3.   Biomechanics

Taylorism - इन्होंने ने Taylorism पर ज़ोर दिया जिसका अर्थ है समूहिक वर्क (work of collectively )अर्थात यदि  अभिनेता 10 की पंक्ती में खढ़े हुये है तो पहले वाले ने 10वें नम्बर पर खढ़े व्यक्ती को थपढ़ मारना है तो वह वह दूसरे वाले को मरेगा और दूसरा तीसरे को और तीसरा चौथे वाले को इस प्रकार नोवा वाला 10वें वाले को अत: इसे कहते हैTaylorism (work of collectively)

दोनों के बीच में अंतर:-


Konstensis Stanislavaski       Vsevolod Mayorhold

1.   Realistic                                           1. Thearical
2.   Psycological inside to  2. Psychological out-
outside                               side to inside.


उदाहरण के लिए :-
James Lang कहते थे react body first and reaction after.




सुश्री नीरजा पटवर्धनजी ( पूने )-

इनकी कार्येशाला मुख्यते मेकअप तथा कास्ट्यूम डिसाइनिंग को लेकर थी और में यही सीखा इनसे पर कुछ समझ नहीं आया परंतु मेंने बहुत प्रयास किया अपने आप की कुछ समझ पाउन पर नहीं अंतते वह पढ़ाने में सक्षम नहीं थी और सभी कार्येशालाओ में से ये सबसे सराब प्रदर्शन वाली कार्येशाला में एक मनुगा और आशा करता हूँ की अच्छे अध्यापकगण लोगों को यहाँ आमंत्रित किया जाये।

कॉस्ट्यूम को लेकर नाटक में तैयारी-

 मेंने इनसे सीखा कि कॉस्ट्यूम को नाटक में कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है जो निंलिखितचरणो में है ;-
2       Script analysis
3       Character analysis
4       Character history
5       Directorial part
6       Physical attributes
7       Design concept
8       Rough Sketching
9       Final Drawing


रूप सज्जा-

रूप सज्जा में इन्होंने प्रयोगात्मक तरीके से समझाया जो प्रैक्टिस करने पर ही समझ आएगा जो कि हमारी university में व्यवस्था नहीं है और इनका समझाया कुछ टोरहा बहुत समझ आया।
अत: में जितना समझ आया में किताबों की मदद से अपने पाठ्यक्रम में सहायता लूँगा।



डॉ.मंगेश बनसोड(मुंबई)-

इनकी कार्येशाला मुख्यते मार्कस्वाद तथा निर्देशन कार्ये एवं नाटक की परिकल्पना के आधार पर निर्देशन कार्येको लेकर थी अत: काफी अच्छी लगी और इन्होंने कुछ अभ्यास भी करायामेंने इनसे बहुत सी अभिनय तकनीकियों के बारे में सीखा और बहुत सी इन्होंने मुझे अर्थात सम्मिलित छात्रों को अभिनय से संबन्धित व्यायाम सीखाये और में इन सभी का प्रयोग अपने अभिनय को सुधारने में करूंगाअत: इन्होने ने काफी कुछ निर्देशन के बारे में जानकारी दी और मेंने इस का अच्छा प्रयोग दी गई संगोष्ठी में किया है और अंतिम परीक्षा में भी करूंगा जो जानकारी इन्होंने दी वह निम्नलिखित है :-



निर्देशन के लिए क्या जरूरी है :-

¨अपने इतिहास और परंपरा की जानकारी होनी चाहिये.
¨निर्देशक के लिये परंपरा और इतिहास का अहसास होना जरुरी हैं.
¨वर्तमान का ज्ञान होना जरुरी हैं.
¨भूतकालीन रंगमंच,कलाकार,नाटक और दर्शक के प्रति सहानुभूती होनी चाहिये.
¨अनुभूती के मार्ग का पता होना चाहिये.
¨वर्तमान समय और जिंदगी को जानना जरुरी हैं.


रंगमंच और निर्देशन:-


¨रंगमंच जिंदगी से जुडा हुआ चाहिये.
¨उसपर काम करनेवाला निर्देशक संवेदनशील होना चाहीये.
¨कला के जरीये जिंदगी में बदलाव लाने का प्रयास होना चाहिये.
¨कला और सौंदर्य को मारनेवाला निर्देशक नही होना चाहिये.
¨निर्देशक ने मानवी जीवन को दुबारा देखना हैं.
¨दर्शकों का विश्वास निर्माण करना हैं.
¨मानवी जीवन के अनुभव को समझना हैं.

सर्जनशील निर्देशक:-

¨रंगमंच जिंदगी से जुडा हुआ चाहिये.
¨उसपर काम करनेवाला निर्देशक संवेदनशील होना चाहीये.
¨कला के जरीये जिंदगी में बदलाव लाने का प्रयास होना चाहिये.
¨कला और सौंदर्य को मारनेवाला निर्देशक नही होना चाहिये.
¨निर्देशक ने मानवी जीवन को दुबारा देखना हैं.
¨दर्शकों का विश्वास निर्माण करना हैं.
¨मानवी जीवन के अनुभव को समझना हैं.

निर्देशक और तंत्रज्ञ संबंध:-

¨निर्देशक और लेखक
¨निर्देशक और निर्माता
¨निर्देशक और नेपथ्य रचनाकार
¨निर्देशक और संगीत निर्देशक
¨निर्देशक और प्रकाश योजनाकार
¨निर्देशक और रंगसज्जाकार
¨निर्देशक और वस्त्रसज्जाकार
¨निर्देशक और मंच प्रबंधक


निर्देशक के प्रकार:-

¨अभिनेता निर्देशक
¨चिकित्सक निर्देशक
¨प्रबंधक निर्देशक
¨हुकुमशाह निर्देशक
¨रबर स्टम्प निर्देशक
¨सर्जनशील निर्देशक


बर्तोल्डब्रेख्त (१८९८-१९५६)-

जर्मनी के नाटककार तथा नाट्य-सिद्धांतो के प्रवर्तक :-


बर्तोल्ड ब्रेख्त के महत्वपूर्ण नाटक :

Three Penny Opera: तीन पैशाचा तमाशा (मराठी)
Galileo
The Caucasian Chalk Circle: कडीया का घेरा (हिंदी)
Mother Courage and Her Children: हिम्मतमाई (हिंदी)
The Life of The Master Race


ब्रेख्त की शैली :-

ऐतिहासीकरण ( Historyfication ) :
 १. नाटक के लिये जो विषय चुना गया है वह समकालीन घटना या यथार्थवाद का पुरस्कार करनेवाला नही चाहिये.
 २. उसका संबंध जीवित व्यक्तीके साथ नही होना चाहिये. रंगमंच पर जो भी मंचन किया जायेगा वह वर्तमान से भिन्न हो.
 ३. उसके लिये भिन्न जगह तथा भिन्न समय का चयन ब्रेख्त को अपेक्षित हैं. इसे ब्रेख्त ऐतिहासीकरण (Historyfication) कहते हैं

ऐतिहासीकरण:-


४. नाटककार ने बीती घटनाओं का उपयोग करना चाहिये.
५. नाटक की परिस्थिती में दर्शको ने भूमिका लेनी चाहिये. ऐसा वातावरण नाटक में नाटककार ने तयार करना चाहिये.
हमें जैसा चाहिये वैसा सामाजिक बदलाव दर्शक ला सकते हैं ऐसा विचार दर्शको ने करना चाहिये.
दर्शक को नाटक से अलगाव होना चाहिये.


अलगाव ( Alineation ):-

रंगमंच पर आभासी तंत्र का उपयोग होना चाहिये.
रंगमंच पर वास्तव दर्शन नही होना चाहिये
रंगमंच पर जो घट रहा हैं उसमें दर्शक दूर चाहिये.
दर्शक नाटक पर टिप्पणी कर सके.
नाटक में मंचित कला का स्वतंत्र अस्तित्व हैं.
विपरीत आभास निर्माण किया तो अलगाव का परिणाम दिखता हैं.

एपिक ( महाकाव्य ):-

ब्रेख्त अपने नाटक को एपिक (महाकाव्य) मानते हैं.
एपिक में फलित के तरफ देखा नही जाता.
ब्रेख्त के लिये उपाय ( Solution) से ज्यादा रुची प्रश्न या समस्या (Problems) को दिखाने में हैं.
नाटक में अभिनेता और दर्शकों का संवाद होना चाहिये.
नाटक की सामग्री दर्शकों को दिखनी चाहिये.
उदा. ( लाईट,नेपथ्य आदि. )
एपिक नाटक से रंजन की अपेक्षा नही.
दर्शकोंको ज्ञान,उपदेश देना तथा परिस्थिती में बदलाव लाना.


एपिक नाटक की विशेषता:-

दर्शक भावनाविवश नही होना चाहिये.
दर्शकों ने विचार करना चाहिये.
अभिनेता अपने आपको चरित्र से अलग रखता हैं.
नाटक मंचन की शैली निवेदनात्मक.
दर्शकों को निरीक्षण करने के लिये बाध्य करना.
जवाब दर्शकों पर निर्भर.
नाटक के द्वारा वैश्विक अनुभूती देना.
नाटक में चर्चा होनी चाहिये.


एपिक नाटक की विशेषता:-

दर्शक ने चिकित्सक वृत्तीसे पढाई करता हैं.
मानव जैसा हैं वैसा उसे स्वीकारा नाही जाता.
नाटक की प्रक्रिया में उत्सुकता होती है
नाटक के प्रसंग स्वतंत्र रह सकते हैं.
नाटक में अभिनेता और दर्शक दोनो कोअपने अस्तित्व का पता होना चाहिये

ब्रेख्त के मृत्यू के बाद...

ब्रेख्त की मृत्यू १९५६ को हुई. उनके मृत्यू के पश्चात कॉन्सटांटीननामके समीक्षक ने कहा,”ब्रेख्त की मृत्यू से कलाक्षेत्र पर बडा आघात हुआ हैं.उनके जाने से जर्मन रंगमंच सुना हो गया हैं. वो सुनापन दुसरा कोई भी भरकर नही निकाल सकता हैं. उनके जाने से सिर्फ जर्मनीही नही तो दुनियाभर के रंगमंच को ये नुकसान उठाना पडेगा.



बादल सरकार(बांगला नाटककार):-

आधुनिक भारतीय रंगमंच के विकास में एक विशिष्ट योगदान
एक प्रबुद्ध रंगचिंतक
तिसरे रंगमंच का सिद्धांत
छ्ठे और सातवे दशक का स्वर्णिम काल
महत्वपूर्ण नाटक:-
पगला घोडा
एवम् इंद्रजीत
बाकी इतिहास
जुलूस
तिसरा रंगमंच:-
रंगमंच जीवित आदमी का जीवित आदमी से संवाद
इल्युजन ऑफ रियालिटी ( यथार्थ का भ्रम )
-        भ्रम को बनाये रखना.
-        तिसरे रंगमंच का निर्माण
-        ( सेट,लाईट,कास्चुम- खर्चिला)
-        - कोई सेट,कास्चुम,प्रॉपर्टी, प्रोसिनियम नही.
-        दर्शक और अभिनेता के बीच सिद्ध संबंध स्थापित करना.
-        चरित्रो की आपस में टकराहट
-        पात्रो में दर्शक अपने आपको देख सके.
-        रोजमर्रा की जिंदगी से नाटक की शुरुआत.
-        पत्र भिखारी,छात्र,बेरोजगार,सेठ
-        पात्रों की बजाय दर्शोकों से संवाद
-        कोई भी कथावस्तू मंचित होने का भरोसा.
-        अभिनेता में बदलाव.
-        रूढीवादी अभिनय की बजाये अपने अंदर के अभिनेता को जगाना,


भारतीय लोकनाट्यो की शैलीया....
भारत विविध परंपरा और संस्कृती से सजा हुआ देश हैं.
यहा जिस तऱ्ह से विविध भाषायें, वेशभूषायें, संस्कृती, परंपरा दिखाही देती हैं, उसी तर्ह भारत में लोककलायें भी बासी हुई हैं.
यह कला अपने विशिष्टता से उन प्रदेशों की खास पहचान बनी हुई हैं.
कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक यह वैविध्यपूर्ण , रंगारंग तथा अपने भाषा, वेशभूषा, संस्कृती को लेकर इन कलाओं ने अपनी पहचान बनाई हैं.


-        कश्मीर का भांड पाथेर:-
-        कश्मीर में भांड पाथेर नाम का लोकनाट्य खेला जाता हैं.
-        भांड याने अभिनेता और पाथेर याने समस्या.
-        सूर्यास्त के बाद नाटक खेला जाता हैं.
-        भांड पाथेर दल गाव गाव जाकर वहा की समस्या उजागर करते हैं.
-        कश्मीर की बढती अस्थिर स्थिती का प्रभाव भांड पाथेर पर पडा दिखाई देता हैं.
उत्तर प्रदेश : नौटंकी तथा स्वांग:-
नौटंकी के सारे कलाकार गायक होते हैं.
नौटंकी में संगीत और गायन अनिवार्य रूप से दिखता हैं.
विविध विषयों पर आधारित कथायें होती हैं.
दर्शकों को अभिनेता के अभिनय और गायन से अलग अलग रस का प्रत्यय मिलता हैं.
आसाम : अंकीया नाट:-

भारत के उत्तर पूर्व राज्य आसाम में अंकीया नाट इस लोकनाट्य की परंपरा दिखाई देती हैं.
अंकीया नाट प्रदर्शन को भाओना कहा जाता हैं.
भाओना नाट्य प्रदर्शित करना (आसामी शब्द)
अंकीया नाट के लिये कोई स्थायी रंगमंच नही होता.
प्रार्थना के लिये बनायें सामाजिक स्थान नामघर के प्रांगण में खेले जाते है, तब वहां पंडाल खडा किया जाता हैं.जिसे रंभाघर कहा जाता हैं.
नामघर जहा स्थित होता हैं,उसे सत्र कहा जाता हैं.
सत्र एक सामाजिक तथा धार्मिक संस्था हैं, जहा भागवत धर्म के लोग नाट्य प्रदर्शन करते हैं.
यह किसी भगवान की मूर्ती की पूजा नही की जाती, सिर्फ भागवत की पूजा और भागवत का गान ही समस्त भक्तों की दिनचर्या हैं.
अभिनय और प्रस्तुतीकरण की विधीया, संगीत और नाट्य का मिला-जुला प्रयोग ही अंकीया नाट का प्राणतत्व हैं, जो मध्ययुग के सांगीतिकरंगमंच का सच्चा आभास करती हैं.
बिहार : नटूवा नाच:-
यह महाकाव्यात्मक लोकगाथा हैं.
खासकर बेगुसराय ,खड्गीया जिले में गायी जाती हैं.
नटूवा दयाल बिहार की पिछडी जाति गोढी (मल्लाह) समुदाय से थे.
मल्लाह लोग दयाल सिंह की दुहाई देते हैं. उसकी पूजा करते हैं.
इसलिये नटूवा नाच को दयाल सिंह का नाच भी कहते हैं.
दयाल अपने लोककल्याणकारी कार्यों के लिये लोगों में पूजित हैं.
केरल : चवीट्टूनाटकम:-
दक्षिण भारत में चवीट्टूनाटकम पारंपारिक नाट्य हैं.
यह इसाईयों द्वारा अभिनित किया जानेवाला सांगीतात्मक नाटक हैं.
भारत में यह एकमात्र इसाईयों द्वारा खेले जानेवाला नाटक हैं.
इस नाट्यरूप में युरोपीय नाट्य को भारतीय नाट्यशिल्प में प्रस्तुत किया जाता हैं.
केरळ की स्थानीय संगीत और नृत्य कला की इसपर छाप पडी हैं.
चवीट्ट- पद पदन्यास. मैदानों में नाटक खेला जाता हैं.
रातभर चलता हैं. स्त्री वेशधारी पुरुष.

महाराष्ट्र : तमाशा:-
महाराष्ट्र का प्रसिद्ध लोकनाट्य तमाशा हैं.
२०० साल की परंपरा हैं.
गण, गौळण, बतावणी, लावणी और वगनाट्य प्रस्तुती.
लावणी नृत्य शृंगारिक होता हैं,
वगनाट्य में सामाजिक,ऐतिहासिक,पारिवारिक कथा होती हैं.
यह नाटक जत्रा में किया जाता हैं.
तमाशा रातभर चलनेवाला नाटक हैं.
अन्य प्रांत:-
गुजरात : भवाई
मध्यप्रदेश : नाच
तामिळनाडू : तारूकट्टू
उत्तर प्रदेश : रासलीला, नौटंकी
केरला : थय्यम
मणिपूर : टांगटा, वारी, लिबा
अपनी वैशिष्ट्यपूर्ण खास शैली.
वेशभूषा, भाषा , नृत्य, नाट्य दिखाई देता हैं.


हिंदी के महत्वपूर्ण यथार्थवादी नाटककार:-
मोहन राकेश के नाटक :
आषाढ का एक दिन
आधे-अधुरे
लहरों के राजहंस 
अनुवाद : मृच्छकटिक, शाकुंतलम

हेन्रीक इब्सेन(विश्व रंगमंच के महान यथार्थवादी नाटककार):-

नॉर्वेजियन नाटककार
युरोप में प्रसिध्द
अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया में भी प्रसिद्ध.
इब्सेन के महत्वपूर्ण नाटक:-
कॅटेलिना १८५०
ब्रांद १८६६
द लीग ऑव युथ १८६९ (पहला यथार्थवादी नाटक)
हेडा गेब्लर- १८९०
मास्टर बिल्डर             लिटल इयोल्फ
जॉन गब्रिएल बोर्कमन       व्हेन वुई डेड अवेकन
पिलर ऑफ द सोसायटी- १८७७
एनिमी ऑफ द पिपल- १८८२
घोस्ट - १८८१               द वाईल्ड डक - १८८४
द डॉल्स हाऊस १८७९        द लेडी फ्रॉम द सी
इब्सेन यथार्थवादी नाटकों के जनक हैं.
इब्सेन ने मुखौटे फाडे.
इब्सेन के नाटकों में स्त्रिया ज्यादा आती हैं.
नारी मुक्तीयह विषय प्रिय.
इब्सेन के नाटकों में स्त्री व्यक्तिरेखा मध्यवर्ती रही हैं.
समस्या:-
झुठापन
लालच
पत्नी पर अन्याय
असफल विवाह
स्वार्थ
नैतिकता
इस वजह से इब्सेन समस्या नाटक लिखनेवाले समाज सुधारक थे.
इब्सेन के नाटक का संघर्ष:-
प्रतिगामी प्रवृत्ती के खिलाफ पुरोगामी विचार.
राजकीय भ्रष्टाचार
नारी का हक
अच्छाई का आग्रह
इब्सेन की विशेषता:-
यथार्थवादी नाटकों के जनक
नारी के प्रश्न को उजागर करनेवाला पहिला नाटककार
वैचारिक रंगमंच का जनक
नाट्यलेखन में प्रयोगशील नाटककार.

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