|
महात्मागांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी
विश्वविद्यालय,वर्धा
![]()
संत्रात पत्र
नाट्यकला एवं फिल्म अध्ययन विभाग
प्रशन पत्र–तृतीय(भारतीय फिल्मों का वर्तमान पृदृश्य )
विषय:-“सिनेमा आज पूरी तरह से बाजार वाद की गिरफ्त मेंआ गया है“ इस कथन की व्याख्या करें ।
|
सिनेमा
आज पूरी तरह से बाजार वाद की गिरफ्त में आ गया है–
पहले के समय में जब सिनेमा शुरू हुआ तो सिनेमा का मुख्य कारण मनोरंजन था और लोगों तक
सामाज में चल रही बुराइयोंसे परिचित करा उनमे सुधार करवाना
था और मुख्य रूप से स्त्रियॉं का सिनेमा में काम करने को बुरा माना जाता था पर
आज के समय में सिनेमा में काम करना अधिकतर व्यक्तियों का सपना बन गया हैउसका मुख्य कारण है Glamour, पैसा, एशों
आराम और इस को पाने के लिए आज की महिलाए मुंबई जा कर अपनी इजत भी दाओ पर लगा देती है यहाँ तक की एक पुरुष
भी ।
आज
सिनेमा के 100 साल पूरे हो चुके है और 100 वर्ष पहले जब इस विधा ने जन्म लिया तो कुछ समय में ही यह एक विस्फोटक
विधा साबित हुई इसकी मौजूदगी जादुई साबित हुईथी शुरू में ही इस विधा पर व्यावसायिक दबाव थे इस दबाव के
कारण भी फिल्म विधा में हिंसा और सेक्स के चित्रण का जबर्दस्त आकर्षण रहा है । फिल्म
विधा की ताकत भी अनोखी है आसानी से असंख्य लोगों तक पहुँचा
जा सकता था और है भाषा
और संस्कृति की दीवारों को लांधकर अंधेरे में बेठे दर्शकों
को उनके कमजोर क्षणों में दबोचा जा सकता था इसका परिणाम यह हुआ कि पूंजीवादीदेशों
ने मनोरंजन और व्यापार के अदभूत रिश्ते को इस विधा में देखा और समाजवादी देशों ने
इस विधा में प्रचार की अनौखी क्षमता देखी है। दुनिया भर में फिल्म विधा मनोरंजन के
साथ साथ व्यापार और कला के तनाव भरे रिश्ते को शुरू से ही झेलती आ रही है । फिल्मकार
Camera का कलम की तरह इस्तेमाल करता है और इसका जीता जागता उदाहरण है हमारे सामने
फिल्म “छबीस ग्याहरा”जिसमें निर्देशक राम गोपाल वर्मा ने
मुंबई हमले के बारे में हुबा हुब दिखने
की कोशिश की है और आज की जनता पड़ने में कम दिलचस्पी लेती है और मनोरंजन के माध्यम
से देखने में ज्यादा दिलचस्पी
लेती है अत: नाटकीय रूप ज्यादा पसन्द करती है परिणाम स्वरूप
फिल्म में व्यवसायीकता बड़ती जा रही है। ऐसा कोई फ़िल्मकार नहीं है जो यह कहे की बॉक्स
ऑफिस से मेरा कोई संबंध
नहीं है यदि कोई ऐसा कहता है तो वह पाखंडी है।
फिल्म
मेंव्यवसायीकता बड़ाने
ने के लिए दिखाये जाने वाले आपत्तीजनक दृश्य और कीये जाने वाले आपतिजनक संवाद पर एक
मशीनरी ने रोक लगा दी और वह है Censor Board । इस
सबसे प्रमुख सरकारी संस्था Censor Boardने
अपनी दृष्टि में लगभग क्रांतिकारी
परिवर्तन किए ।
यदि
किसी फिल्म की Sreen Play अच्छी
नहीं है तो वह किसी बड़े सितारे के रहने पर अच्छी
चलती है अत:
सलमान,
शाहरुख,अमीर खान के रहने पर सुपर डुपर हिट होती हैजैसे
की दबंग -2 की Screen Play के बारे मे श्रीअरबाज़ खान जी ने स्वंय अपने एक Interview मे ये
स्वीकारा था की इस का Screen Play अच्छा
नहीं था परंतु ये श्री सलमान खान जी के रहने पर अच्छी कमाई कर गई। कहने
का सीधा सीधा तात्पर्य है की व्यवसायीकता पर खरी उतरती है और सुनने में आता है कि फलानी फिल्म सफल रही क्योंकी उसने
निर्माता निर्देशक की Pocket 300,00000 (तीन सौ करोड़) से भरदी ।आज के समय में नई तकनीकीकरण
आने के बाद से ही Multiplexपर
रिलीज हुई फिल्म के कुछ महीने बाद ही वह फिल्म टी.वी॰ पर चैनलों
में “ग्रांड
टेलीविज़न प्रीमियर “द्वारा नई फिल्में प्रिमियरहोती है और बचे कूचे व्यापार को पा लेती है जैसे कि अभी के
समय मेंटी॰वी॰ पर रिलीज होने जा रही “बजरंगी बाई “। आज के समय में मल्टीप्लेक्स
कल्चर बिल्कुल ही नया अनुभव है । यह मुंबई व
अन्य महानगरों के बाद हिन्दी प्रदेशों की राजधानियों के
इलावा अन्य शहरों में बन रहे मल्टीप्लेक्स ने हिन्दी फिल्मों को नए दर्शकों के साथ
नए विषय भी दिये है। अत: इसका जगह जगह बनाया जाने का सीधा सीधा अर्थ है कि व्यवसाय। मल्टीप्लेक्स सिनेमा हाल एक आकर्ष होता है जो आधुनिक
सुविधों से भरपूर होता है और उसमें शोचालेय भी आधुनिल
सुविधाजन होता है और जनता उसका एक बार प्रयोग करती है तो बार बार आती है।
सिनेमा
का क्षेत्र अब मनोरंजन की नजर से न रहकर धीरे धीरे व्यवसायीकताकी तरफ बड़ रहा है । सन 26 जनवरी में भारत की फिल्म
जगत को उधयोग
का दर्जा श्रीमती सुषमा स्वराज जी ने
दिलवाया था ।बाजार वाद नुख्यत: एक सतत प्रक्रीया है जिसके अंतर्गत उत्पाद ,मूल्य,
स्थान ,
प्रोत्साहन ही योजना बनाई जाती है एवं इस
संन्धित कार्ये किया जाता है यह प्रक्रिया
व्यक्तियों और संगठनों के बीच उत्पादों ,सेवाओं , या
विचारों के विनियम के लिए की जाती है । यवसाय को एक रचनात्मक उद्योग
के रूप में देखा जाता है जिसमें शामिल है Advertising ,
Distribution, Selling इसका सीधा सम्बन्ध ग्राहकों की भावी आवश्यकताओं
और आकांक्षाओं का पूर्व विचार करने से भी है जो प्राय: बाजार शोध के माध्यम से पता लगाई जाती है।
मूलत:
बाजारवाद किसी संगठन को बनाने या निर्देशित करने की प्रक्रिया
है ताकि लोगों को सफलतापूर्वक वह उत्पाद या सेवा बेची जा सकेजिसकी न केवल उन्हें जरूरत है बल्कि वह उसे खरीदने के
इच्छुक भी है। इसलिए अच्छा व्यवसाय इस काबिल होना चाहिए कि वह उपभोक्ताओं के लिए
एक “प्रस्ताव”या लोगों का सेट बना सके ताकि उत्पादों या सेवाओं के
माध्यम से ग्राहक को उसके पैसे का मूल्य अदा किया जा सके ।
ठीक
यही बात सिनेमा क्षेत्र में लागू होती
है। जब कोई भी
फिल्म बनकर तैयार होने वाली होती है तो ज़ोरों
शोरों सेउसकी Promotionor Publicityशुरू
हो जाती है जैसे अभी सलमान खान की आने
वालीफिल्म जो की दीपावली पर रिलीज होने जा रही है जिसका नाम है “प्रेम रतन धन पायो ” इस
फिल्म की Promotion or Publicity जोरों शोरों से शुरू हो चुकी है जिससे यह क्रिया
दर्शकों में देखने की उत्सुकता और चाहा पैदा करती है और यह क्रिया भी आज के समय
में फिल्म बेचने का एक आज के समय में प्रचलित तरीका बन गया है। सिनेमा उधोग में एक बात तो तय है कि फिल्म भले ही चले या न चले पर फिल्म को कैसे बैचना है इसमें बहुत
ही अच्छी ख़ासी महारथ हासिल हो गई है ।
फिल्म
निर्माण के व्यवसाय को चलाने के लिए तीन कड़ियों का महत्वपूर्ण योगदान
होता है जो कि काफी अहम भूमिका निभा रहे है :-
1. निर्माता (Producer)
2. वितरक
(Distributor)
3. प्रदर्शक
(Audience)
1.
निर्माता
(Producer)-
फिल्म निर्माता फिल्म के बजट को तय करता है ।
निर्माता के मुनाफे सिनेमाई मनोरंजन में कहानी पर विचार आदि करने के लिए और अपने
या अपने व्यसायिक और रचनात्म दृष्टि में साझा करने के लिए दूसरों को राजी करने के
लिए भूमिका प्रदान करता है । निर्माता की ज़िम्मेदारी उत्पादन कंपनी और वित्तीय और
वितरक की और से उत्पादन की निगरानी के लिए नियुक्त किया जाता है जो कार्यकारी
निर्माता है । फिल्म पूरी बन जाने के बाद निर्माता फिल्म वितरक के साथ मिलकर सौदा
करता है निर्माता के कई भूमिकाएँ होती है जो इस प्रकार है :-
1॰
उत्पादन के लिए वित्त को सुरक्षित करने की क्षमता
2.
उत्पादन बजट तेयार करने और नियंत्रित करने की क्षमता
3.
उत्कृष्ट संचार कौशल
4.
दबाव में अच्छी तरह से काम करने और उत्पादन टीम को
प्रेरित करने की क्षमता
5.
अभ्यास के नियमों और कोड के
साथ अनुपालन सुनिश्चित करना आदि।
निर्माताओं की और भी निम्न श्रेणियाँ
होती है जो इस प्रकार है :-
स्थापित निर्माता -
यह
प्रमुख निर्माता होते है जिनकी अपनी फिल्म निर्माण कंपनी है और जिनका अपना
स्टुडियो है । ऐसे फिल्म निर्माताओ के पास यहाँ आमतौर पर धन की कमी नहीं होती है ।
स्थापित निर्माताओं की अपनी शाखा होती है उनकी फिल्मों को लेकर बाजार में अंतिम
माहौल होता है । लिहाजा वितरक भी उनकी फिल्म का प्रदर्शन करने के लिए आसानी से
तैयार हो जाते है । इन निर्माताओं में प्रमुख है धर्मा प्रोडक्शन के करन जौहर, यश राज फिल्मस् के आदित्य चौपड़ाइत्यादि
।
निर्देशक-सह
निर्माता–
इन्हे
प्रतिबद्ध फ़िल्मकार माना जाता है। यह निर्माता का दायित्व भी वहन करते है और निर्देशक का भी
जिम्मा संभालते है फिल्म के लिए धन की व्यवस्था ऐसे फ़िल्मकार
अपने बलबूते पर भी करते है । कई ऐसे शख्स है जो अपनी फिल्में निर्देशित कर निर्मित
करते है जैसे श्याम बेनेगल,अनुराग
कश्यप इत्यादि ।
अभिनेता-सह
निर्माता–
इसमें
अभिनेता एसोसियट प्रोड्यूसर पर कार्यरत फिल्म के निर्माण में सहायक होते है । इसका
अच्छा खासा उदाहरण हम सैफ अली खान का ले सकते है जो सह निर्माता कि भूमिका अदा कर
चुके है । इनकी प्रमुख फिल्में थी लव , आजकल
और कल (2009),
काकटेल (2012) ऐसे ही जोन अब्राहम की विककी डोनर (2012) है ।
प्रेरक
निर्माता–
सार्थक
सिनेमा के सिलसिले में नये विषयों पर बनी फिल्मों के निर्माता जो फिल्म का निर्माण
करते है। देश में अच्छे और उदेश्यपूर्ण सार्थक सिनेमा को आगे बड़ाने के माध्यम से NFDC (
राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम ) व कम चर्चित लेकिन प्रतिबध फ़िल्मकारॉ की फिल्मों के
लिए कम ब्याज दरों पर धन उपलब्ध कराता है ।
कापोरेट
कंपनियाँ –
सिनेमा
को उधोग का दर्जे देने के बाद बड़ी कापोरेट फिल्म निर्माण के व्यवसाय में आ गयी। यह
कंपनियाँ किसी व्यवसायिक उत्पाद के भाँति फिल्म निर्माण की गतिविधियों को संचालित
करती है और एक निर्धारित बजट में तय शुदा अवधि के दौरान फिल्म निर्माण को पूरा
करने के लिए किए जाते है ।
1.
वितरक -
एक
फिल्म वितरक एक कंपनी या एक फिल्म की मार्केटिंग के लिए जिम्मेदार व्यक्ति होता है
वितरक निर्धारित या तय करते है कि फिल्म के रिलीज की
तारीख तयकरकेकब प्रदर्शन करें।आज के डिजिटलाइजेशन के माध्यम से वितरक ऐसी डीवीडी या Blu-रे के
रूप में फिल्म का सौदा सिनेमाघरों के मालिकों से करता है।
फिल्म
वितरक दो तरीके से पैसा कमाता है :-
1. एक मृष्ठ रायल्टी
2. मिनिमम
गारंटी यानि MG प्रणाली
पहले वाले तरीके से फिल्म वितरक एक फिल्म को पाँच साल के लिए
खरीदता है ।वितरक को यह पता रहता है कि वहफिल्म जो खरीद रहा है अगर वह फिल्म हिटहोती तो उसकी मांग आने वाले सालों में कितनी पड़ सकती
है कुछ सिनेमाहाल है जहां एक ही फिल्म कई महीनो तक लगी रहती है जैसे जयपुर के “राजमंदिर“ के हाल में “राजश्री”प्रोडक्शन्स की फिल्म कई महीनो तक लगी रहती है।
ज्यादा
तर वितरक दूसरे तरीके को ही अपनाते है इसमें वितरक वही 5 साल के लिए फिल्म खरीद लेता है जब रिलीज
होती हैतो उसमें पूर्व लगाई गई राशि सिनेमा घरों से जो धन
प्राप्त होता है वह 50-50% फिल्म वितरक और निर्माता दोनों ही आपस में बाँट लेते
है ।
2.
प्रदर्शक –
इस
आखिरी कड़ी में प्रदर्शक यानि जनता कि अहम भूमिका होती है क्योंकि जनता जनार्दन ही
तय करती है कि प्रति शुक्रवार फिल्म जो रिलीज होगी वह हिट
है या फ्लाप । इसी आधार पर बॉक्स- आफिस की रिपोर्ट तय की जाती है।
संदर्भसूची
–
॰क्लास
नोट्स –डा॰ रयाज़ हसन जी
॰ सिनेमा
कल आज कल –श्री
विनोद भारदवाज़ जी
॰ सिने
पत्रकारिता –श्री
श्याम माथुर जी
॰ विकिपीडिया

No comments:
Post a Comment