Thursday, 14 April 2016

नाट्यकला एवं फिल्म अध्ययन विभाग के एम॰ ए॰ तृतीय छमाही के छत्रों हेतु । विषय:-भारतीय काव्यशास्त्र की विशेषता क्या ?




संगोष्ठी पत्र

नाट्यकला एवं फिल्म अध्ययन विभाग के एम॰ ए॰ तृतीय छमाही के छत्रों हेतु । 

विषय:-भारतीय काव्यशास्त्र की विशेषता क्या ?

काव्यशास्त्रका अर्थ
काव्यशास्त्रकि विशेषता बताने से पहले काव्यशास्त्र है क्या?इस का अर्थ क्या है ?ये बताना जरूरी है 
काव्य का नियमन करने वाला शास्त्र काव्यशास्त्र कहलाता है इसे काव्यलोचन, काव्यमीमांसा, साहित्यशास्त्र,सामीक्षाशास्त्र आदि नामो से भी पुकारा जाता हैकवियो के कुछ मानदण्डनिर्धारित करते हुये उन मापदण्ड पर काव्यो की आलोचना की जाती है काव्य का लक्ष्य रासो की अनुभूति कराना है जो सोन्द्र्ये की अनुभूती के माध्यम से आनन्द की आनुभूति है। सोन्दर्ये का प्रधान लक्षय होने के कारण काव्य काला है जो मन को हरती है।
दूसरे शब्दों मे काव्यशास्त्र काव्य और साहित्य का दर्शन तथा विज्ञान है।यह काव्यकृतियों के विश्लेषण के आधार पर समय-समय पर उद्भावित सिद्धांतों की ज्ञानराशि है।
युगानुरूप परिस्थितियों के अनुसार काव्य और साहित्य का कथ्य और शिल्प बदलता रहता है; फलत: काव्यशास्त्रीय सिद्धांतों में भी निरंतर परिवर्तन होता रहा है। भारत में भरत के सिद्धांतों से लेकर आज तक और पश्चिम में सुकरात और उसके शिष्य प्लेटो से लेकर अद्यतन "नवआलोचना' (नियो-क्रिटिसिज्म़) तक के सिद्धांतों के ऐतिहासिक अनुशीलन से यह बात साफ हो जाती है। भारत में काव्य नाटकादि कृतियों को 'लक्ष्य ग्रंथ' तथा सैद्धांतिक ग्रंथों को 'लक्षण ग्रंथ' कहा जाता है। ये लक्षण ग्रंथ सदा लक्ष्य ग्रंथ के पश्चाद्भावनी तथा अनुगामी है और महान्‌ कवि इनकी लीक को चुनौती देते देखे जाते हैं।
काव्यशास्त्र के लिए पुराने नाम 'साहित्यशास्त्र' तथा 'अलंकारशास्त्र' हैं और साहित्य के व्यापक रचनात्मक वाङमय को समेटने पर इसे 'समीक्षाशास्त्र' भी कहा जाने लगा। मूलत: काव्यशास्त्रीय चिंतन शब्दकाव्य (महाकाव्य एवं मुक्तक) तथा दृश्यकाव्य (नाटक) के ही सम्बंध में सिद्धांत स्थिर करता देखा जाता है। अरस्तू के "पोयटिक्स" में कामेडी, ट्रैजेडी, तथा एपिक की समीक्षात्मक कसौटी का आकलन है और भरत का नाट्यशास्त्र केवल रूपक या दृश्यकाव्य की ही समीक्षा के सिद्धांत प्रस्तुत करता है। भारत और पश्चिम में यह चिंतन ई.पू. तीसरी चौथी शती से ही प्रौढ़ रूप में मिलने लगता है जो इस बात का परिचायक है कि काव्य के विषय में विचार विमर्श कई सदियों पहले ही शुरू हो चुका था।
काव्यशास्त्र का रस सिदान्त नाटक के लिए लागू किया गया था उसको मुक्त करने के लिए नाट्यशास्त्रिय सोन्दर्येशास्त्र इस चिन्तन का जन्म हुआ।
काव्यशास्त्रीय अध्ययन
काव्यशास्त्र के अंतर्गत किस-किस चीज का अध्ययन करते है :-
1 काव्य भाषा 2 वस्तु (जोकि नीजी ना होकर सार्वजनिक हो )
3 बिम्ब 4 प्रतीक 5 सोन्दर्ये 6 भाषा लक्षण 7 अलंकार 8 छंद
          अरस्तू के अनुसार काव्य में लोक कल्याण की भावना होनी चाहिए नाटक की भाषा पात्रो /चरित्रों की होती है न कि नाटय लेखक की होती है।
अभिज्ञान शकुंतलम का काव्यशास्त्री अध्ययन निम्नलिखित आधार पर होगा :-
1 नाटय भाषा 2 वस्तु 3 शिल्प/Craft4 बिम्ब व प्रतीक ।
काव्यशास्त्र से नन्दिकेश्वर का जुढ़ाव–
नन्दिकेश्वरशिव के अंतेवासी एवम उनके प्रमुख गण थे। शिव की उपासना के अतरिक्त जितना भी समय बचता था उसे वे शास्त्र चिन्तन में व्यतीत करते थे। उनके सनीध्ये में रहे कर उन्होने जो कुछ भी सुना या सीखा उसे शास्त्र के रूप में प्रकट किया। विद्वानो के अनुसार अब तक उनकी जो रचनाएँ ज्ञात हो सकी है उन में से काव्यशास्त्र एक है जो निम्नलिखित है:-
“वात्स्यान के अनुसार  नन्दिकेश्वर जी ने काव्यशास्त्र पर एक ग्रन्थ लिखा था, जिसमे सहस अध्याय थे। नन्दिकेश्वर जी के इस ग्रन्थ का संक्षेपण श्वेतकेतु ने किया था। बाद में फिर वात्स्यान ने संक्षेपणकर कामसूत्र की रचना की।“
अग्निपुराण के अनुसार काव्य के भेद
अग्नि पुराण के अनुसार काव्य के तीन भेद है
1॰ गध 2॰ पध 3॰ मिश्र ।
इसी प्रकार इन तीन प्रकार के काव्य के आगे कई भेद है ।
काव्यशास्त्र पर अरस्तू की विचारधारा
अरस्तू प्लेटो के शिष्य थे। वास्तव में वह काव्यशास्त्री थे वह अपने गुरू की तरह नियामक (नियम के अनुसार ) शासक की मुद्रा में बात न कर काव्य- समीक्षक  की भांती बात करते है। परिणामत: अरस्तू ने प्लेटो के एकांगीपन दोष का परिहार किया और एक अनुकृति सिद्वांत, दो विरेचन सिद्वांत प्रस्तुत किये । प्लेटो के अनुसार कविता हमारी भावनाओ को उद्वेलित करता है। इस का नीर।करणकरते हुए अरस्तू नेविरेचन का सिद्वांत  प्रस्तुत किया।
काव्य के लक्षण-
भाषा विज्ञान में ये एक स्वीकार किया गया नियम है कि जब एक ही अर्थ के लिए दो शब्दों का समान प्रयोग प्रचलित होता है तब कालान्तर  में उनके अर्थो में पृथक होने की रेखाएँ गाढ़ी होने लगती है यही काव्य और साहित्य के लक्षणो और चरित्रों के संदर्भ में भी सोचा जाता है। काव्य का प्रयोग पधात्मक रचनाओ के लिए रूढ़ हो गया है और साहित्य से सभी विधाओ का घोतन होने लगा है जबकि काव्यशास्त्र अथवा साहित्य शास्त्र के अंतर्गत काव्य और साहित्य एक दूसरे के समानार्थी समझे गए है। 
                                      कविता की भावना से संबन्धित और कला से संबन्धित इनके विलक्षणताओं के संदर्भ में अनेक परिभाषाए दी। भामह ने अपने काव्यालंकार में संकेत दिया है ही शब्द और अर्थ मिलकर काव्य का निर्माण करते है। वामन ने इस धारणा को विस्तार देते हुये अपने काव्यालंकार में सूत्र में लिखा है की काव्य शब्द गुण तथा अलंकार से संस्कारित शब्द और अर्थ के लिए प्रयुक्त होता है।



संदर्भसूची 

सुगम काव्ये शास्त्र –   ड़ा॰ बलेन्दुशेखर तिवारी जी और डा॰ सुरेश                                                                              महेशवरी जी  
डा॰ सतीश पावड़े जी    कक्षा व्याख्यान 

नाट्यशास्त्र का इतिहास–  डा॰ पारस नाथ द्विवेदी जी 

नोट्स –                        वरिष्ठ कक्षा छात्र

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