Saturday, 9 April 2016

किसी भी नाटक की सफलता में मंच प्रबंधन की क्या भूमिका है ।

किसी भी नाटक की सफलता में मंच प्रबंधन की क्या भूमिका है ।


     मैनेजमेंट का सही अर्थ क्या है, यह बताने मे हमे कठिनाई होती है। मैनेजमेंट के मूल सिद्धांत हम अपनी जिंदगी में रोजाना प्रयोग में लाते ही हैं पर कॉर्पोरेट कल्चर में इन मैनेजमेंट के सिद्धांतों को परिस्थितियों की कसौटी पर नापा जाता है।


मैनेजमेंट के चार प्रमुख सिद्वांत

1.                योजना  बनाना
2.                   संगठित करना
3.                   निर्देशित करना
4.                   निगरानी रखना

     मैनेजमेंट का मतलब केवल काम लेना या काम करने की योजना भर बनाना 

नहीं बल्कि इसे कला व विज्ञान दोनों कहा जाता है। मैनेजमेंट का मतलब लोगों को

 और अधिक कार्यशील बनाना यह कला हो गई और इसे कैसे कर सकते है यह 

विज्ञान हो गया। 

     यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि किसी भी कंपनी या उद्योग में आखिर

 मैनेजमेंट करने वाले मैनेजर की जरूरत ही क्यों पड़ती है? इसका सबसे अच्छा 

उदाहरण है कि किसी भी कंपनी में चार कर्मी मिलकर आठ घंटे की एक शिफ्ट में

 प्रतिदिन 6 इकाइयाँ बनाते थे। अब अगर वहाँ कंपनी ने मैनेजर रखा और उत्पादन 

वही है तब मैनेजर की जरूरत ही नहीं। 6 की जगह 8 इकाइयाँ बनती हैं तब मैनेजर

 वहाँ काम कर रहा है यह सिद्ध होता है। 


भारतीय उद्योग जगत ने पश्चिम को बताया है कि प्रबंधकीय विशेषज्ञता में वह भी 

उनसे कंधे मिला सकता है। आज कई बहुराष्ट्रीय भारतीय कंपनिया ने विदेशों में 

जाकर अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों से न केवल टक्कर ली है बल्कि उनसे ज्यादा

अच्छे परिणाम दिए हैं। टीसीएस, इंफोसिस, आईसीआईसीआई, महिन्द्रा, टाटा आदि 

कपनीयाँ इस का उदाहरण है। इन कंपनियों की सफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण

 है इनकी प्रबंधकीय विशेषज्ञता। आज के इस आधुनिक युग में उद्योग लगाना 

काफी आसान हो गया है क्योंकि उद्योगों को अनुमति देने से लेकर इसे फाइनेंस 

करने के लिए तमाम तरह की सुविधाएँ उपलब्ध हैं और काफी कम समय में आप 

उद्योग लगा सकते हैं। पर सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है उस उद्योग को प्रबंधकीय कौशल 

से चलाना और विकास के पथ पर तेज गति से दौड़ाना ।

     प्रबंधन की आवश्यकता केवल उद्धोग क्षेत्र मे ही नहीं बल्कि फिल्म और थियेटर मे भी काफी हद तक माइने रखती है । बिना मंजमेंट के फिल्म या नाटक करने मे काफी हद तक त्रुटि होने की संभावना रहती है।
फिल्म बनाना एक या नाटक करना ये एक ग्रूप का काम होता है ये काम अकेले करना किसी के लिए भी संभव नहीं होता है और इस काम को पूरे प्लान के साथ करने की अवस्यकता होती है । इस हिसाब से  चाहिए  कि इनमे प्रबंधन का कार्य व्यवस्थित ढंग से होना चाहिए  ।

रंगमंच तथा फिल्म प्रबंधन -;
    रंगमंच तथा फिल्म मे  प्रबन्धक का कार्य बहमूल्य होता है । रंगमंच मे प्रस्तुती पूर्व से लेकर प्रस्तुति बाद का कार्य होता है चाहे वो मंच सामग्री का हो या वस्त्र, लाइट ,मेक अप रूम के अंदर कि व्यवस्था , साउंड तथा  फस्टेड बॉक्स  कि व्यवस्था आदि प्रस्तुति पूर्व एक प्रबन्धक को करना पड़ता है रंगमंच पेक्षागृह मे किसी प्रकार कि परेशानी या कोई अव्यवस्था न हो एक प्रबन्धक को प्रस्तुति से पूर्व ये जांच लेनी चाहिए । प्रबन्धक को हर समय निर्देशक से और निर्देशक को भी चाहिए कि प्रबन्धक से ताल मेल बनाकर रखे एक प्रबन्धक का ये दायित्व होता है कि नाटक प्रस्तुत से पूर्व सभी लाइटे अच्छी तरह से जांच ले ताकि प्रस्तुति के दौरान कोई समस्या का सामना करना न पड़े वस्त्र विन्यास करता से नाटक से पूर्व उसकी तैयारी  प्रबन्धक को करवानी पड़ती है तथा f.o.h आदि को सही ढंग से जांच लेनी चाहिए । प्रबन्धक का कार्य  नाटक के हर पहलू हर हिस्से मे होता है मंच सामग्री कि पूरी लिस्ट बनाकर समय पर उपलब्द कराना तथा अभिनेताओ के लिए उनका हस्त सामग्री आदि कि समय पर व्यवस्था करना फस्ट ऐड बॉक्स को चेक कर लेनी चाहिए कि उनमे वो हर चीज उपलब्द है जिसकी अवस्यकता प्र्स्तुती के दौरान पड़ सकती है । नाटक के प्रबन्धक को नाटक के दौरान सभी जगहो पर ध्यान देना चाहिए चाहे तकनीकी स्थल जैसे लाइट साउंड ,या   मेकरूम मे सभी सामग्री कि जांच कर लेनी चाहिए कि कही कोई समान छुट तो नहीं गयी  है ।    फिल्म मे भी प्रस्तुति पूर्व मे प्रबंधन का काम अहम होता है । फिल्म मे जब स्क्रीन प्ले तैयार हो जाता है तो फिर निर्देशक का चयन महत्वपूर्ण होता है उसके बाद चरित्र के हिसाब से अभिनेताओ का चयन होता है फिर कैमरे का व्यवस्था करना होता लाइट , रिफलेक्टर ,शूटिंग के दौरान पूरी टिम को नास्ता , खाना आदि कि व्यवस्था  । फिल्म बनाना एक बहुत बड़ा काम होता है इस हिसाब से इसमे पेपर वर्क काफी होता है और मानेजमेंट कि अवश्यकता भी काफी हद तक होती जब सब तय हो जाता है तो । प्रबन्धक का काम लोकेशन पर जाने हेतु गाड़ी कि व्यवस्था करना लोकेसन पर बैठने हेतु कुर्सी, लोकेसन आउटडोर है तो पोलिस प्रोटेक्सन की व्यवस्था करना  र्आदि फिल्म हो चाहे रंगमंच हो प्रबंधन का महत्व दोनों मे ही लगभग बराबर ही होता है । नाटक मे नाटक के समाप्त होने के बाद प्रबन्धक कार्य होता है कि प्रबन्धक वो पूरा समान समेटकर जहाँ से समान मंगवाया है वो उसे वहाँ पहुँचा दे । वर्तमान में फिल्में  अधिक बजट कि बन रही है और फिल्मों मे कुछ आर्थिक सहयोग हो इसलिए आज कल बॉलीवूड मे मनेजमेंट के लिए एम.बी.. पास विशेषज्ञ को प्रबंधन का काम दे दिया जाता है उनका काम होता है कि फिल्मों के अंदर क्या प्रयोग किया जाए कि आर्थिक सहयोग मिल सके वो फिल्मों मे वो निम्न वस्तुओं का प्रयोग करवाते जिससे उनका प्रचार होता है और उसके बदले उस प्रॉडक्ट निर्माता से पैसे लेते है उदाहरण के तौर पर अगर फिल्म मे अभिनेता द्वारा टूथपेस्ट का प्रयोग से लेकर बाइक , कपड़ा , साबुन , कोल्ड ड्रिंक आदि का प्रयोग करते समय उसे साफ दर्शको के सामने प्रस्तुत करते है । इसका प्रयोग फिल्मों मे करने से पहले इस प्रॉडक्ट के मालिक से डील करनी पड़ती है तथा इस तरह से फिल्मों मे एक आर्थिक सहयोग भी मिल जाता है । फिल्म मे ये प्रबन्धक का एक महत्वपूर्ण काम होता है रंगमंच मे चुकी हर जगह व्यवसायिक थियेटर तो है नहीं इसलिए प्रबन्धक को फुक फुक कर कदम रखना पड़ता है । रंगमंच मे प्रबन्धक को वित्तीय क्षेत्र का काफी ध्यान रखना पड़ता है एक प्रबन्धक हमेशा ये सोचता है कि वो कम लागत मे अच्छा काम कर ले लेकिन फिल्म मे लागत का नहीं सोचते उन्हे परफेक्ट काम चाहिए भले ही पैसा पाँच के जगह दस लग जाए ।
फिल्मांकन के बाद फिल्म मे प्रबन्धक का काम होता है कि शूटिंग के जगह से सारा समान पैक कर के सुरक्षित  जगह पर भेजवाए । जीतने भी समान जैसे लाइट , कैमेरा , पूरी तकनीकी सामग्री को वापस व्यवस्थित करे अगर शूटिंग आउट डोर या आउट ऑफ स्टेन है तो पूरी टीम को होटल मे ठहरने की व्यवस्था तथा उनके भोजन की व्यवस्था आदि प्रबन्धक कि जीमेदारी होती है । नाटक में  भी अगर आउट आफ स्टेन नाटक करना है तो कलाकारो के जाने हेतु वाहन कि व्यवस्था करना तथा सभी कलकारों के भोजन, ठहरने आदि कि व्यवस्था करना प्रबन्धक का ही कार्य होता है  
कलाकारों कि जरूरत के सभी समान समय पर उपलब्ध  करना प्रबन्धक का कर्तव्य होता है । चाहे वो नाटक हो या फिल्म का हो दोनों का लगभग काम एक जैसा होता है बशर्ते फिल्म मे प्रबन्धक की मेहनत कुछ अधिक होती  है ।
फिल्म हो चाहे नाटक प्रबन्धक का काम हर कदम पर दिखाता है। निर्देशक का काम निर्देशन अभिनेता का काम अभिनया इस तरह से सब का अपना एक स्पेल काम है लेकिन प्रबन्धक एक ऐसा हिस्सा होता है कि जिससे लगभग सभी को काम पड़ता है बिना प्रबन्धक के पूरा प्रोडक्शन एक अनाथ कि भांति लगेगा और पूरा प्रोडक्शन   का बेलेन्स बिगड़ सकता है । एक प्रोडक्शन  मेनेजर पूरे प्रोडक्शन की बैसाखी होती है ।
निष्कर्ष

निष्कर्ष के तौर पर बात करें तो चाहे नाटक हो या फिल्म प्रबन्धक कि भूमिका इन दोनों विधाओ मे अत्यंत महत्वपूर्ण होती है । दूसरे शब्दो में कहे तो पूरी प्रक्रिया का वो व्यवस्थापक होता है बिना प्रबन्धक के न तो निर्देशक अपना काम ठीक से कर सकता न ही अभिनेता और न ही तकनीकी पक्ष क्योंकि इन सभी को व्यवस्था मुहैया कराने का काम प्रबन्धक  का ही होता है । एक पूरे प्रोडक्शन का कार्यभार लगभग प्रबन्धक पर ही होता है ।


संदर्भसूची :-

कक्षा व्याख्यान – श्रीमती सुरभि बिप्लव जी



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