Thursday, 14 April 2016

( नाट्यकला एवं फिल्म अध्ययन विभाग के एम॰ ए॰ तृतीय छमाही के छत्रों हेतु) विषय:- नाटय निर्देशन की अवधारणा स्पष्ट कर निर्देशक की कार्ये योजना एक नाटय निर्देशन के रूप में स्पष्ट करें।



संगोष्ठी पत्र

नाट्यकला एवं फिल्म अध्ययन विभाग के एम॰ ए॰ तृतीय छमाही के छत्रों हेतु । 

विषय:- नाटय निर्देशन की अवधारणा स्पष्ट कर निर्देशक की कार्ये योजना एक नाटय निर्देशन के रूप में स्पष्ट करें।

निर्देशक का अर्थ-

एक निर्देशक वह होता है जो एक अधिक मात्रा में लिखे हुये लेख को नाटकिए रूप में दर्शको के सामने रखता है और अपनी बात उन तक नाटक के माध्यम से अपनी नाटक मंडली के सभी सदस्यो का सहारा ले पहूंचाता है।
दूसरे शब्दो में एक निर्देश वह व्यक्ती है जो अपनी नाटक मंडली के सभी सदस्यो से अच्छा ताल मेल रखता है और सभी से बना के रखता है चाहे वो प्रकाश व्यवस्था करने वाला हो या रूप सज्जा करने वाला हो या मंच विन्यासकारी हो या ध्वनी संचालित करने वाला हो।

निर्देशकके लिये जरुरी-:

1॰      अपने इतिहास और परंपरा की जानकारी होनी चाहिये-
एक निर्देशकके लिये जरुरी हैकि उसे अपने इतिहास और परंपरा की जानकारी होनी चाहिए और विशेष कर जिस स्क्रीप्त को वह उठा नाटक करने जा रहा है वह उसमें वर्णित इतिहास और परंपरा से  परिचित होना चाहिए ।
2॰      निर्देशक के लिये परंपरा और इतिहास का अहसास होना जरुरी हैं-
    एक निर्देशकके लिये जरुरी हैकि उसे इतिहास और परंपरा का अहसास होना चाहिए ।
३॰     वर्तमान का ज्ञान होना जरुरी हैं-
          एक निर्देशकके लिये जरुरी हैकि उसे वर्तमान का ज्ञान होना जरुरी हैंयदि वह वर्तमान से परिचित नहीं है तो उसके लिए अपनी बात को दर्शको और प्रेक्षको तक पहूंचाने में कठिनाई होगी। एक निर्देशक को आज के समय के साथ चलना होता है और आज के समय के साथ यदि वह नहीं चलता है तो वह आज के समय में हो रही समस्याओं को दर्शको और प्रेक्षको के सामने नहीं रख पायेगा।

4॰     भूतकालीन रंगमंच,कलाकार,नाटक और दर्शक के प्रति सहानुभूती होनी चाहिये-

          एक निर्देशकके लिये जरुरी हैकिउसे भूतकालीन रंगमंच,कलाकार,नाटक और दर्शक के प्रति सहानुभूतीहोनी चाहिये यदि उसके अंदर इन सब की कमी होगी तो वह रंगमंच पर कभी सफल नाटकार नहीं बन पाएगा और दर्शको और प्रेक्षको की मांग पर खरा नहीं उतर पाएगा।

5.     अनुभूती के मार्ग का पता होना चाहिये-

एक निर्देशकके लिये जरुरी हैकिवह जिस नाटक को करने जा रहा है तो उसे उसकी अनुभूती अर्थात जानकारी होनी चाहिए जिस समय के बारे में उसमें वर्णित है उसके बिना वह उस समय को और नाटक के विषय को दर्शकों और प्रेक्षकों तक नहीं पहुंचा सकेगा।

6    वर्तमान समय और जिंदगी को जानना जरुरी हैं-

एक निर्देशकके लिये जरुरी हैकिउसे वर्तमान समय और जिंदगी को जानना जरुरी हैं इस जानकारी के बिना वह अपनी बात को पूरी तरह स्पष्ट नहीं कर पाएगा।

रंगमंच और निर्देशक

1॰ रंगमंच जिंदगी से जुडा हुआ चाहिये.
2॰ उसपर काम करनेवाला निर्देशक संवेदनशील होना चाहीये.
3॰ कला के जरीये जिंदगी में बदलाव लाने का प्रयास होना चाहिये.
4. कला और सौंदर्य को मारनेवाला निर्देशक नही होना चाहिये
5. निर्देशक ने मानवी जीवन को दुबारा देखना हैं.
6. दर्शकों का विश्वास निर्माण करना हैं.
7.मानवी जीवन के अनुभव को समझना हैं.

निर्देशक और तंत्रज्ञ संबंध

1.  निर्देशकऔरलेखक

2.  निर्देशक और निर्माता
3.  निर्देशक और नेपथ्य रचनाकार
4.  निर्देशक और संगीत निर्देशक
5.  निर्देशक और प्रकाश योजनाकार
6.  निर्देशक और रंगसज्जाकार
7.  निर्देशक और वस्त्रसज्जाकार
8.  निर्देशक और मंच प्रबंधक

सर्जनशील निर्देशक

1.              

1.1.   नाटककार ने लिखा हुआ नाटक, उसका विषय और मर्म अभिनेता /अभिनेत्री के माध्यम से       दर्शकों तक पहुचाता हैं.


2.  निर्देशक की नाटक से संबंधित सभी तंत्रज्ञ पर पकड होनी चाहिये.
3.  निर्देशक में अभिनेता/अभिनेत्री को समझने की क्षमता होनी चाहिये.
4.  नाटककार,कलाकार,तंत्रज्ञ के साथ अच्छे और सर्जनशील संबंध होने चाहिये.

निर्देशक के प्रकार

1     1.अभिनेता निर्देशक
2.  चिकित्सक निर्देशक
3.  प्रबंधक निर्देशक
4.  हुकुमशाह निर्देशक
5.  रबर स्टम्प निर्देशक
6.  सर्जनशील निर्देशक


संदर्भसूची

कक्षा व्याख्यान – डा॰प्रो.डॉ.मंगेश बनसोडअकॅडेमी ऑफ                                                                        थिएटर आर्ट्स,मुंबई विश्वविद्यालय,मुंबई

No comments:

Post a Comment